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अनुसन्धान-५५
महिकी दूध तणी खीर रांधी, कीधौ सखरण बहु दही बांधी । भात पछै वड ल्यौ दूध घोली, खांड साकर तस मांहे भेली ॥२२॥ गंगोदक भरी निर्मल पांणी, करौ चलू इम बोलत त्रिशलादे राणी ।
साहिब के साहिब गुणचंदा, सिद्धारथ कुल उदयो दिणंदा ॥२३॥ भणै गुणै वर्धमान रसोई त्यां घर मंगल नित नित होइ - ईति सुंखडी ॥
C/o. प्रसन्नचन्द्र आराधना भुवन,
तलाटी रोड, पालीताणा