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________________ 100 बोलावे सुललित वाणी, नवि बोले सारंगपाणि जब मुख ऊघाडी जोवें, साद करीने सरलें रोवें ॥९॥ बोल बोल ते (ने) माहरा भाई, बंधवनें रह्यो गल लाई पगे दीठो लागो घाय, किंणे सूरे हण्यो वन माय ||१०|| बांहि झालीने बेंठो कीधो, उपाडी पंधोले लीधो तिहांथी चाल्यो वनह मझारि, श्रीकृष्णनो दुख अपार ||११|| हूं वहिलो नीर न लायो, तिणि कारणें खरो रे रीसायो हवे बोलो कृष्ण कृपा करी मोरी, हूं शेवा चूको तमारी ॥१२॥ बहू वयण प्रकासी बोले, तोही बंधव बोल न बोलें, विलखांणो वदन विमासी, कुण कुबुद्धि थई वनवासी ||१३|| दुख दीधा यादव वीर, मधु माखण गालण धीर देवता य उपाय करावें, शिल्हा ऊपरि पोयण वावें ||१४| दुहा शिल्हा उपरि पोयणी, किम उगसें गमार मूओ मडो जो जीवसों, तो उगसें अपार ॥१५॥ अनुसंधान - २४ चालि इम चिंती मनमें जाणी, एक वेलू पीलावें घांणी तूं मूरिख जोइ विमासी, आ वेलू केम पीलासी ? ||१६|| मूओ मडो जो जीवें तो तेल बलें एणे दीवें बोलाव्यो ऋटकी बोलें, बलभद्र पड्यो डमडोलें ||१७|| जब विणसण लागी काया, तव बलभद्रे छांडी माया. बावना चंदन सूकड लीधां, संसार तणा कारज कीधां ॥ १८ ॥ जीव जोईनें विमासी जोई, धर्म विना सगो नहीं कोइ जइ वंद्या नेमकुमार, तिहां संयम लीधो सार ||१९|| Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229603
Book TitlePt Kesar Krut Stavan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRasila Kadia
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages10
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size303 KB
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