SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 19
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ५४ अनुसन्धान-५५ अथ भोजनविच्छत्ति प्राह । भलो उत्तंगतोरण मांडवो । उत्तंग तोरण | तुरत नवो बैसवानुं आंगणो । ते तो नील रतनतणो ॥ ससहा मांड्या आसण । वइसवानी किसी विमासण । आगलि मूंकी सोनानी आटणी । ते किम जाई छांडणी ॥ ऊपरि मूक्या सोनाना रुपाना थाल । अत्यंत विशाल । विचिमई चउसठि वाटकी । लिगार नहि जाटि काटकी ॥ गंगोदक दिधा थाल । कचोलानइं हाथ पवित्र कीधा । सगली पांति बइंसती हुइ । इन्द्र इन्द्राणी निरखती । तलई प्रीसणहारी आवी । देखता लोकनई मनि भावी ॥ ते केवी हैं — सोलशृंगार सज्या । बीजा काम सहु तज्या । हाथनी रुडी । बिहु बाहइं खलकै चूडी ॥ लघलाघवनी कला । मन कीधा मोकला ॥ चित्तनी उदार । अति घणुं दातार ॥ दोलतनी हाथ । परमेश्वर देवे तेहनो साथ ॥ धसमसती आवी । गलानई मनि भावी ॥ पहेलु फलहल प्रीसइं । सगलाना मन हिसई ॥ पाका आंबानी कातली ॥ ते बूरा खांडसुं भरी ॥ अनइं वली पातली पाका केला । ते वली खांडसुं किधा भेलां । सखराकरणां । ते वली पीला वरणा || नीला नारंगा । रंगइँ दीसता सुरंगा। कौंली रायण प्रीसि, भायिण दाडमनी कूली । खातां पूगइ मननी रली । तिम जानइं अखरोट, खाता उपजई मननी कोडी ॥ द्राख नई बिदाम, केइ कागदी केइ स्यांम । सलेमी कुहारा खारिक खजुरि ते प्रीस्या भरपुर || नालेरनी गिरी, ते मालवा गोलसुं भरी । लींबू मीठा नई खाटा । एहतो कहे न दीठा । परीस्या चारोली नई पिसता । लोक जीमई हसता । वली सेलडीनइं सहाफल । ते पिण प्रीस्यां परिघल ॥
SR No.229572
Book TitleShilodahrutikalpavalli
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages23
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size272 KB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy