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________________ जुलाई-२००७ जनमाभिषेक महंत महिमा सुनत सब सुख पावहीं त्रैलोक्यनाथ सुदेव जिनवर जगत मंगल गावहीं ||१२|| इति श्री जन्मकल्यानकं द्वितीयं ।। ॥ श्रम जल रहित शरीर सदा सविमल रह्यौ खीरवरन वर-रुधिर प्रथम अक्षित लह्यौ । प्रथम ससिरसहि नान-सरूप बिराजहीं सहज सुगंध सुलच्छन मंडित बाजहीं ॥१॥ बाजहीं अतुल वल परमप्रिय हित मधुर बचन सुहावने दश सहज अतिशय सौभाग्य मूरति बाल लीला अति बने । याबाल त्रिकालपति मुनिरुचित उचित जु नित नए अमरीपति तपति त अनुपम सकल भोग निभोग ए (?) ॥२॥ भव-तन-भोग-विरक्त कदाचित चिंतए धन यौवन पिय पुत्त सकल अनित्य ए । कोउ न सरन मरन-दिन-दुख चिहुगति भर्यो सुख दुख भोक्ता एक जीव विधिवसि पर्यो ॥३॥ परयौ विधिवसि आन चेतन आन जड जु कलेवरू तन असचि परतिहिं होइ आश्रव परहि परिहर संवरू । निर्जरा तप बल होइ समकित बिन सदा त्रिभुवन भमे दुर्लभ विवेक बिना न कबहूं परम धरम विषे रमे ॥४॥ ए प्रभु बारे पावन भावन भाईओ लोकांतिक वर देव सुजोगें आईओ । कुसुमांजलि देइ चरनकमल सिर नाईओ स्वयंबुद्ध प्रभु स्तुति करत हि समझाईओ ||५|| समझाय प्रभुकुं गए निज पद फुनि महोत्सव हरि कीओ रुचि रुचिर चित्र विचित्र शिबिका करसुं नंदनवन लियो । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.229454
Book TitleJinanam Panchkalayanakani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShilchandrasuri
PublisherZZ_Anusandhan
Publication Year
Total Pages10
LanguageHindi
ClassificationArticle & 0_not_categorized
File Size305 KB
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