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________________ विश्वधर्मो के परिप्रेक्ष्य में जैन उपासक का साधना पथ : एक तुलनात्मक विवेचन | ३६७ ईसाई धर्म मुख्यतः नीति एवं सद्व्यवहार प्रधान है। ईसा मसीह ने मानव समाज को विशेषरूप से पाँच आदेश दिये (१) पुराने धर्मग्रन्थ में कहा है कि 'किसी की हत्या मत करो' जो आदमी हत्या करता है, वह गुनहगार है । पर, मैं तुमसे कहता हूँ कि जो आदमी अपने भाई पर गुस्सा करता है, वह परमात्मा की नजर में गुनहगार है । प्रार्थना करने से पहले अपने भाई पर मन में जो क्रोध हो, उसे निकाल दो। उससे सुलह करलो । (२) मैं तुमसे कहता हूँ कि व्यभिचार तो करना ही नहीं चाहिए, किसी स्त्री पर बुरी नजर भी नहीं डालनी चाहिए। किसी पर कुदृष्टि डालने वाला भी ईश्वर के आगे गुनहगार है। जो आदमी पत्नी को तलाक देता है, वह खुद व्यभिचार करता है और पत्नी से भी व्यभिचार कराने का कारण बनता है, जो आदमी उससे विवाह करता है, उसे भी वह गुनहगार बनाता है । (३) पुराने धर्म-ग्रन्थ में कहा है कि 'कसम न खाओ किन्तु परमात्मा के आगे अपनी प्रतिज्ञाओं पर डटे रहो।' पर मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम्हें किसी भी हालत में कसम नहीं खानी चाहिए। किसी के बारे में पूछा जाय तो 'हां' या 'ना' में जवाब देना चाहिए । (४) पुराने धर्म-ग्रन्थ में कहा है कि 'आंख के बदले में आँख फोड़ दो, दाँत के बदले दाँत तोड़ दो ।' तो पर मैं तुमसे कहता हूँ कि बुराई का बदला बुराई से मत दो। कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर चांटा मारे, तुम बाँया गाल भी उसके सामने कर दो । ( ५ ) पुराने धर्म-ग्रन्थ में कहा है कि 'केवल अपनी ही जाति के लोगों से प्रेम करो ।' पर मैं तुमसे कहता हूँ कि तुम्हें हर आदमी से प्रेम करना चाहिए। जो तुम्हारे दुश्मन हों, उनसे भी प्रेम करना चाहिए। सभी मनुष्य एक ही पिता की सन्तान हैं । सब भाई-भाई हैं । १० सबके साथ तुम्हें प्रेम का व्यवहार करना चाहिए ।" उपर्युक्त विवेचन का सारांश यह है कि ईसाई धर्म के अनुसार गृही साधकों का आदर्श यह हो कि वे सबके साथ मंत्री से रहें, सात्त्विक दृष्टि हों, वचन के धनी हों, बदले की भावना न रखें, सबसे प्रेम करें । जैसा कि पहले कहा गया है, ईसाई धर्म में सेवा का बड़ा महत्त्व है। प्रभु की प्रसन्नता का यह मुख्य कारण है । यहाँ तात्त्विक दृष्टि से एक बात विशेष विचारणीय है, ईसाई धर्म के अनुयायियों में सेवा की जो इतनी विराट् भावना पनप सकी, उसका वास्तविक प्रेरक हेतु क्या है ? गहराई में जाने से प्रतीत होता है कि सेवा करने वाला ईसाई अपने मन में यह भावना लिये रहता है कि उसकी सेवा के परिणामस्वरूप लाभान्वित व्यक्ति स्वयं उसके धर्म में प्रविष्ट होगा, जो उसके लिए सच्चा धर्म है। एक ईसाई की लोक-सेवा में जो अत्यधिक तन्मयता देखी जाती है, उसके पीछे यही मुख्य सात्विक हेतु है। दार्शनिक दृष्टि से यह उपयोगितावादी दूरदर्शितापूर्ण चिन्तन है, जिसका परिणाम भारत, अफ्रीकन देश आदि विश्व के अनेक भागों में स्पष्ट देखा जा सकता है। ईसाई धर्म के अत्यधिक विस्तार का मी मुख्य कारण इसे ही कहा जा सकता है । अन्यान्य धर्मों में गृहस्थ की धार्मिक स्थिति सर्वप्रथम भारतीय धर्मों में सिक्ख धर्म पर कुछ विचार करें। दार्शनिक दृष्टि से इसे हिन्दू धर्म से पृथक नहीं कहा जा सकता । जिस अकाल पुरुष या निराकार परमात्मा की उपासना का जो स्वरूप सिक्ख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानकदेव ने बताया, वह या वैसा - विवेचन-भेद से हमें उपनिषद् वाङ्मय में प्राप्त होता है। पर, व्यवहारतः धर्मों की गणना में इसे एक स्वतन्त्र धर्म गिना जाता है । गुरुनानकदेव का चिन्तन तात्त्विक दृष्टि से कुछ-कुछ इसी सरणि का था, जैसा कबीर आदि निर्गुणोपासक सन्तों का था । यही कारण है कि गुरु ग्रन्थ साहब में कबीर, रैदास आदि सन्तों की वाणी - का भी समावेश है । सन्त मत में जिस प्रकार संन्यास का कोई स्थान नहीं है, सिक्ख धर्म में भी वैसा ही है । गुरु पद पर अधिष्ठित व्यक्ति भी गृहस्थ ही होते रहे हैं । गुरुनानकदेव ने अपने अनुयायियों को तीन आदेश- आचरण के तीन सूत्र दिये, जो इस प्रकार है: 1 2 " (१) नाम जपो (२) किरत करो और (२) मण्ड के छको पसीने की कमाई मिल बांटकर खाओ जो ऐसा करते हैं, उन्हीं को वाह गुरु का, परम प्रभु का प्रसाद मिलता है ।" १६ hello Jain Education International ~ WW ZAM For Private & Personal Use Only lla 000000000000 * MINIM 000000000000 XO0ODOCEED ·SB74 www.jainelibrary.org
SR No.211937
Book TitleVishwa Dharmi ke Pariprekshya me Jain Upasak ka Sadhna Path Ek Tulanatmak Vivechan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBasant Jain
PublisherZ_Ambalalji_Maharaj_Abhinandan_Granth_012038.pdf
Publication Year1976
Total Pages15
LanguageHindi
ClassificationArticle & Comparative Study
File Size2 MB
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