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________________ ३०६ ] पं० जगन्मोहनलाल शास्त्री साधुवाद ग्रन्थ [खण्ड (अ) संप्राप्ति : यह कफ-वातात्मक दुर्जर महाव्याधि है । इसका उद्भव आमाशय या पित्त स्थान से होता है । इसकी अभिव्यक्ति प्राणवह स्रोतप्त फुप्फुस-स्थित श्वास नलिका द्वारा होती है। रोगो द्वारा अधिक मात्रा में पर्याप्त समय तक अम्ल-लवणात्मक शीत-स्निग्ध-गुरु-पिच्छिल गुणी आहार ग्रहण करने से उसका सम्यक परिपाक नहीं हो पाता। अपरिपक्व आहार-रस से आमदोष की उत्पत्ति होती है। इससे अग्नि मन्दता होती है जिससे विकृत कफ उत्पन्न होता है। यही विकृत कफ अपक्व रसों के साथ शरीर तन्त्र में संवहन और परिभ्रमण करता हआ फुफ्फस में आता है और श्वासनलिका में विकृत या मलकफ के रूप में एकत्र होकर श्वास क्रिया का अवरोध कर प्राणवह स्रोतस में स्रोतोरोध के द्वारा श्वास रोग की उत्पत्ति करता है। श्वास न ले पाने से दम फूलने लगता है, घबराहट होती है, कासवेग आने लगते हैं। अधिक समय तक श्वासरोध के कारण आँखों के आगे अन्धेरा छाने लगता है तथा प्राण संकट की सम्भावना प्रतीत होने लगती है। खांसते-खांसते यदि प्रयत्न पूर्वक थोड़ा-सा भी कफ निकल जाता है तो किचित् लल एवं सुख को अनुभूति होती है । कुछ समय पश्चात् श्वास कष्ट की प्रक्रिया पुनः प्रारम्भ हो जाती है। आधुनिक चिकित्सक यह मानते हैं कि कफ निकाल देने से रोगी ठीक हो जायेगा। इसलिये श्वास रोग में कफ निःसारक, श्वास नलिका विस्फारक या कफशामक औषधियों का आवश्यकतानुसार उपयोग कर वे रोगी को स्थायी लाभ पहुँचा देते हैं। पर इस चिकित्सा विधि से रोगोन्मूलन नहीं हो पाता। इसका कारण यह है कि उत्पादित कफ तो चिकित्सा द्वारा निकल जाता है परन्तु कफोत्पादन की प्रक्रिया की चिकित्सा तो होती ही नहीं है। इसलिये रोग और कष्ट-दोनों ही बने रहते हैं। यह स्थिति ठीक उसी प्रकार की है जैसे वृक्ष की शाखा या पत्र तो काट दिये, पर जड़ नहीं काटी । फलतः वह समुचित पोषण मिलने पर अंकुरित एवं पल्लवित होने लगता है । इस समस्या को दृष्टिगत रखते हुए रोग की शमन और संशोधन-दो प्रकार की चिकित्सा का विधान किया है । उपरोक्त चिकित्सा विधि शमनात्मक है। संशोधन चिकित्सा द्वारा दोषोन्मूलन होकर पुनः व्याधि की सम्भावना नहीं रहती । इस विधि में वमन चिकित्सा विधि द्वारा आमाशय के विकृत कफ की उत्पादन प्रक्रिया का उन्मूलन किया जाता है। इससे इस दुर्जर व्याधि से छुटकारा पाया जा सकता है। रोगियों की चिकित्सा के समय कभी-कभी ऐसी स्थिति भी परिलक्षित होने लगती है कि अनेक रोगियों को लाभ होने के बावजूद भी, अनेकों को लाभ नहीं हो पाता। ऐसी परिस्थितियों में मन में इस प्रकार के विचार आने लगते हैं कि योग्य निदान एवं चिकित्सा के पश्चात् भी कुछ ऐसे विचार बिन्दु हैं जिनसे सफल चिकित्सा की अधिक संभावना प्रतीत होती है। ऐसे विषयों में चिकित्सा को अंगभत आथर्वणी या ज्योतिष चिकित्सा विधि महत्वपूर्ण है। इस विधि में ग्रह प्रभाव-शांत करने के उपाय तथा कर्म-विपाक शमन रूप धार्मिक पक्ष की विधियाँ महत्वपूर्ण हैं। श्वास रोग के अनेक रोगियों की चिकित्सा के समय उपरोक्त परिस्थियाँ उत्पन्न हई है। इनमें उक्त सहयोगी चिकित्सा विधियों के सहयोग से चिकित्सा करने पर अनुकूल परिणाम भी परिलक्षित हुए हैं। इनमें से ही एक श्वास रोगी की चिकित्सा विधि का उल्लेख प्रस्तुत करना उपयोगो होगा। कन्हैया लाल नामक एक रोगी १९७७ से श्वास रोग से पीड़ित था। चिकित्सा कराते रहने पर उसे लाभ रहता है पर कालान्तर में वह पुनः व्याधिग्रस्त हो जाता है। रोगी को श्वास-कृच्छता रहती है, कभी-कभी दम घुटने जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। अधिक खाँसने पर कुछ कफ निकल जाने के बाद अल्पकालिक किंचित् सुखानुभूति होती है। उसकी अन्य स्थितियाँ भी प्रचण्ड श्वास रोग को निरूपित करतो है। कभी-कभी वह मुछित भी हो जाता है। इन सब आधारों पर उसके तमक श्वास होने का निदान किया गया। एक्स-किरण परीक्षा में भी फुफ्फुस स्थित श्वास नलिका शोथ पाया गया। श्रवण-परीक्षा में फुफ्फुस एवं श्वास नली में घुर्धरक ध्वनि पाई गई जो कफ बाहुल्य एवं Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211864
Book TitleRogopachar me Gruha Shanti evam Dharmik Upayo ka Yogadana
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyanchandra Jain
PublisherZ_Jaganmohanlal_Pandit_Sadhuwad_Granth_012026.pdf
Publication Year1989
Total Pages5
LanguageHindi
ClassificationArticle & Medicine
File Size498 KB
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