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________________ श्रीमन्तो जिन भक्तपूरि-गुरवश्चान्द्रे कुले जज्ञिरे तच्छिष्या जिनलाभसूरिमुनयः श्रीप्रीतितः सागरः । (-कल्याणाख्या स्वपाठकेन सुधियां चेतः प्रसत्त्य सदा) इस टीकाकी रचना आपने अपने शिष्य श्री ज्ञानचन्द्रमनिके कहनेपर की थी और इसमें अन्वयकी खण्डान्वय पद्धतिको अपनाया गया है। यथा-कीदृशान् अर्हतः ? अष्टादशदोषैर्विमुक्तान् पुनर्विशुद्धं निर्मलं यत् ज्ञानं तत्स्वरूपमयानिति, पुनः प्रकटितानि तत्त्वानि यः ते तान इत्यादि । आपकी टीकाकी दूसरी विशेषता यह है कि वह संक्षिप्त होने की अपेक्षा विस्तृतरूपसे पाठके प्रत्येक पदकी साङ्गोपाङ्ग व्याख्या व दार्शनिक स्थलोंका विशदीकरण भी प्रस्तुत करती है। यथा-सतो भावः सत्ताऽस्तित्वमित्यर्थः,सा सर्वेष्वपि एकव वर्तते. च पुनर्द्विविधो नयः द्रव्यपर्यायादिस्वरूपः तथा कालत्रयं गतिचतुष्क पञ्चैव अस्तिकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलजीवस्वरूपाः सन्ति, च पुनद्रव्याणां धर्मास्तिकायादीनां कालद्रव्ययुक्तानां षट्कमस्ति तथा नैगमाद्याः सप्तनयाः सन्ति । श्रीपालचरित-टीका इसमें बीच-बीच में अनेक सुन्दर कहावतोंका प्रयोग भी दर्शनीय है। "पानीयं पीत्वा किल पश्चाद् गृहं पृच्छ्यते” । "दग्धानामपरि स्फोटकदानक्रिया किं करोषि" "पित्तं यदि शर्करया सितोपलया शाम्यति तहि पटोलया कोशितक्या क्षारवल्ल्या किम्" । जीवविचारवृत्ति श्रीजिन आगमके चार अनुयोगोंमें द्रव्यानुयोग मुख्य अनुयोग है । यह वृत्ति द्रव्यानुयोग शाखाके मुख्य अंश जीवविचारपर लिखी गयी है। यद्यपि इस मुख्यांशपर अनेक विद्वानोंने टीकाएं एवं वृत्तियां लिखी हैं किन्तु मुनिप्रवर क्षमाकल्याण द्वारा रचित यह वृत्ति विद्वत् समाजमें सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इस वृत्तिका रचनाकाल भाद्रपद शुक्लपक्षकी सप्तमी संवत् १८५० है। परम्परानुसार वृत्तिकारने इस वृत्ति में भी अपने गुरुओंका आदरके साथ उल्लेख किया है। जिस श्लोक द्वारा गुरु-स्मरण किया गया है वह श्लोक श्रीपालचरितके श्लोकका ही २-३ शब्दोंके हेर-फेरसे किया हुआ एक रूपान्तर मात्र है। जीवविचार भी मूलरूप में प्राकृत भाषाका ग्रन्थ है। इसके प्राकृत सूत्रोंको स्पष्ट रूपसे समझाने के लिए मुनिवरने इस वृत्तिमें संस्कृतका आश्रय लेकर जिस रीतिसे सूत्रोंके सार मर्मको प्रकाशित किया है वह सर्वथा हृदयहारी है। यथा__ "सिद्धा पनरस भेया, तित्थ अतित्थाई सिद्धभेएण । एए सखेवेणं जीवविप्पा समख्खाया"। वृत्ति सिद्धाः सर्वकर्मनिमुक्ता जीवाः, तीर्थंकरातीर्थकरादिसिद्धभेदेन पञ्चदश भेदा ज्ञेयाः । अत्र सूत्रे प्राकृतस्वात्करपदलोपः । तत्र तीर्थंकराः सतो ये सिद्धास्ते तीर्थकरसिद्धाः अतीथंकराः सामान्याः केवलिनः संतो ये सिद्धास्तेऽतीर्थकरसिद्धाः। आदिपदात्तीर्थसिद्धाः अतीर्थसिद्धादिपंचदश भेदा नवतत्त्वादिभ्यो ज्ञातव्याः। इत्थं संक्षेपेण एते जीवानां विकल्पाः भेदाः समाख्याताः कथिताः । -जीवविचारवृत्ति १. संवद् व्योमशिलीमुखाष्ट वसुधा (१८५०) संख्ये नभस्ये सिते पक्षे पावन-सप्तमी सुदिवसे बीकादिनेराभिधे । श्रीमति पूर्णतामभजत व्याख्या सुबोधिन्यसो सम्यक् श्रीगुणचन्द्रसूरिमुनिये गच्छेशतां बिभ्रति ।। १४८ : अगरचन्द नाहटा अभिनन्दन-ग्रन्थ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211702
Book TitleMahopadhyaya Kshamakalyan Gani ki Sanskrut Sahitya Sadhna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDiwakar Sharma
PublisherZ_Agarchand_Nahta_Abhinandan_Granth_Part_2_012043.pdf
Publication Year1977
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Literature
File Size655 KB
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