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________________ २५ 1 के भी पारंगत विद्वान थे। इसके साथ ही आपने कईं वे सदलबल श्रावक-श्राविकाओं से पूर्व ही आचार्य देव के चमत्कारपूर्ण सिद्धियाँ भी प्राप्त की थीं। दर्शनार्थ पहुंच गये और नगर में पधारने की विनत की। इस आचार्यश्री अपने गुरुदेव युगप्रधान श्री जिनदत्तसूरिजी के दिये हुये उपदेश को स्मरण करते हुए दिल्ली नगर में प्रवेश न करने की दृष्टि से मौन रहे। उन्हें मौन देख कर पुनः महाराज ने विशेष अनुरोध किया तो अन्त में आपने नगर में पदार्पण कर महाराज मदनपाल की मनोकामना पूरी की । यद्यपि आचार्यश्री को अपने गुरुदेव की दिल्ली न जाने की आज्ञा का उलंघन करते हुए मानसिक पीड़ा का से एक बार संघ के साथ विहार कर जब दिल्ली की ओर पधार रहे थे तो मार्ग में चोरसिदान ग्राम के समीप संघ ने अपना पड़ाव डाला। उसी समय संघ को यह मालुम हुआ कि कुछ लुटेरे उपद्रव करते हुए इधर ही आ रहे हैं । समाचार से सभी भयभीत हो घबराने लगे। इस प्रकार संप को भयातुर देखकर सूरिजी ने कारण पूछा कि आप भयभीत क्यों हैं? किस कारण से घबरा रहे हैं ? जब आचार्यदेव को यह ज्ञात हुआ कि ये म्लेच्छो व्याकुल हैं, तो उन्होंने तत्काल ही कहा "आप सब निश्चिन्त रहें, किसी का कुछ भी अहित होने वाला नहीं है। प्रभु श्री जिनदत्तसूरिजी सब की रक्षा करेंगे।" इसके पश्चात् आपने मन्त्रध्यान कर अपने दण्ड से संघ के चारों ओर कोट के आकार की रेखा खींच दी। इसका प्रभाव यह हुआ कि संघ के पास से जाते हुए उन म्लेच्छों (लुटेरों) को संघ ने भली प्रकार देखा, किन्तु उनकी दृष्टि संघ पर तनिक भी न पड़ी । इस प्रकार मार्ग में म्लेच्छो पद्रव के भय से संघ मुक्त होकर आचार्य श्री के साथ बिहार करता हुआ क्रमश: दिल्ली के समीप पहुंच गया । अनुभव हो रहा था, तथापि भवितव्यता के कारण आपको दिल्ली नगर में पदार्पण करना ही पड़ा। वहां कुछ समय तक आपने अपने उपदेशों से भव्य जीवों का कल्याण करते हुए आयुशेष निकट जान कर सं० १२२३ भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी को चतुर्विध संघ से क्षमायाचना की एवं अनशन आराधना के पश्चात् आप स्वर्ग सिधार गये। आचार्य श्री जिनचन्द्रसूरिजी के दिल्ली पधारने की सूचना पाकर जब सुन्दर वेशभूषा में सुसजित होकर नगरबासी एवं सौभाग्यवती स्त्रियाँ मंगलगान गाती हुई आचार्य जी के दर्शनार्थ जाने लगी तो उन्हें जाते देखकर राजप्रासाद में बैठे हुए महाराज मदनपाल ने अपने अधिकारियों से पूछा कि नगर के ये विशिष्ट जन कहां जा रहे हैं? उन्होंने कहा—“राजन् ! ये लोग अपने गुरुदेव के स्वागतार्थं जा रहे हैं । आज उनका हमारे नगर के निकट ही पदार्पण हुआ है । गुरुदेव अल्पवयस्क होते हुए भी धर्म के प्रकाण्ड वेत्ता, प्रभाव शाली तथा सुन्दर आकृति वाले हैं ।" यह सुनकर महाराज के मन में भी गुरुदेव के दर्शन की उत्कण्ठा उत्पन्न हुई एवं Jain Education International अन्तिम समय में आपने धावकों के समक्ष यह भविष्य वाणा की कि "नगर से 'जतनी दूर मेरा संस्कार किया जावेगा, नगर की बसावट वस्ती उतनी ही दूर तक बढ़ती जायगी।" इस सम्बन्ध में यह भी कहा जाता है कि आचार्य श्री ने अपने स्वर्गवास के पूर्व ही संघ को बुलाकर यह आदेश दिया था कि "मेरे विमान (रथी) को मध्य में कहीं विश्राम मत देना एवं सीधे नगर से बाहर उसी स्थान पर ले जाकर विश्राम देना, जहाँ दाहसंस्कार करना है ।" शोकाकुल संघने इस आदेश को भूलकर मध्य में ही पूर्व प्रधानुसार विश्राम दे दिया। । इसका परिणाम यह हुआ कि तनिक विश्राम देने के पश्चात् जब विमान को उठाने लगे तो लाख प्रयत्न करने पर भी वह उस स्थान से लेशमात्र भी नहीं सरका राजा मदनपाल को जब यह सूचना मिली तो उन्होंने हाथी के द्वारा विमान को उठवाने की व्यवस्था करवाई; किन्तु उसमें भी सफलता नहीं मिली। For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211612
Book TitleManidharidada Jinchandrasuri
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBhanvarlal Nahta
PublisherZ_Manidhari_Jinchandrasuri_Ashtam_Shatabdi_Smruti_Granth_012019.pdf
Publication Year1971
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Ascetics
File Size4 MB
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