SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 6
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ लाभ और माहात्म्य 'ब्रह्मचर्य, धर्म रूप पद्मसरोवर का पाल के समान रक्षक है। यह तवेसु वा उत्तमं बंभचेरं। दया, क्षमा आदि गुणों का आधार-भूत एवं धर्म की शाखाओं का आधार- सूत्रकृतांग सूत्र स्तम्भ है। ब्रह्मचर्य चर्म रूप महानगर का कोट है और धर्म रूप महानगर "ब्रह्मचर्य ही उत्तम तप है'। का प्रधान रक्षक-द्वार है। ब्रह्मचर्य के खण्डित होने पर सभी प्रकार के ब्रह्मचर्य से क्या लाभ होता है और ब्रह्मचर्य का कैसा महात्म्य धर्म, पहाड़ से गिरे हुए कच्चे घड़े के समान चूर-चूर हो जाते हैं।' है, यह संक्षेप में नीचे बताया जाता है। ब्रह्मचर्य, धर्म का कैसा आवश्यक अंग है, यह बताते हुए और १-शरीर और धर्म का सम्बन्ध ब्रह्मचर्य की प्रशंसा करते हुए एक मुनि ने कहा हैआत्मा का ध्येय, संसार के जन्म-मरण से छूट कर, मोक्ष प्राप्त पंच महव्वए-सुव्वयमूलं, समणामणाइल साहुसुविणं । करना है। आत्मा इस ध्येय को तभी प्राप्त कर सकता है, जब उसे वेरविरामण पज्जवसाणं, सव्वसमुद्द महोदहितित्थ ।।१।। शरीर की सहायता हो-अर्थात् शरीर स्वस्थ हो। बिना शरीर के धर्म तित्थकरेहिं सुदेसिय मग्गं, नरगतिरिच्छविवज्जियमग्गं । नहीं हो सकता और बिना धर्म के आत्मा अपने उक्त ध्येय तक नहीं सब्बपवित्तसुनिम्मियसारं, सिद्धिविमाण-अवंगुयदारं ।।२।। पहुँच सकता। काव्य ग्रंथों में कहा है देवनरिंदनमंसियपूइयं सव्वजगुत्तममंगलमग्गं । शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् । दुद्धरिसं गुणनायकमेक्कं मोक्खपहरसवडिंसगभूयं ।।३।। - कुमारसम्भव 'ब्रह्मचर्य, पाँच महाव्रत का मूल है अत: उत्तम व्रत है अथवा पंच 'शरीर ही सब धर्मों का प्रथम और उत्तम साधन है'। महाव्रत वाले साधुओं के उत्तम व्रतों का ब्रह्मचर्य मूल है। ऐसे ही श्रावकों धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् । के सुव्रतों का भी ब्रह्मचर्य मूल है। ब्रह्मचर्य, दोष रहित है, साधुजनों द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का आरोग्य ही मूल साधन है। भलीभाँति पालन किया गया है, वैरानुबन्ध का अन्त करने वाला है और २-ब्रह्मचर्य से शारीरिक स्वस्थता स्वयंभूरमण महोदधि के समान दुस्तर संसार से तरने का उपाय है।' आत्मा को अपने ध्येय तक पहुँचने के लिए शरीर की ब्रह्मचर्य तीर्थंकरों द्वारा सदुपदेशित है, उन्हीं के द्वारा इसके आवश्यकता है और वह भी आरोग्यता के साथ। अस्वस्थ शरीर, पालन का मार्ग बताया गया है और इसके उपदेश द्वारा नरक गति तथा धर्म-साधन में असमर्थ रहता है। ब्रह्मचर्य से इस अंग की पूर्ति होती तिर्यक-गति का मार्ग रोक कर सिद्ध-गति तथा विमानों के द्वार खोलने है, अर्थात् शरीर स्वस्थ रहता है, कोई रोग पास भी नहीं फटकने पाता। का पवित्र मार्ग बताया गया है। वैद्यक ग्रन्थों में ब्रह्मचर्य से शारीरिक लाभ बताने के लिए यह ब्रह्मचर्य देवेन्द्र और नरेन्द्रों से पजित लोगों के लिए भी कहा है पूजनीय हैं, समस्त लोकों में सर्वोत्तम मंगल का मार्ग है। सब गुणों का मृत्युव्याधिजरानाशि, पीयूषपरमौषधम् । अद्वितीय तथा सर्वश्रेष्ठ नायक है और मोक्ष-मार्ग का भूषण रूप है। ब्रह्मचर्य महायत्नः, सत्यमेव वदाम्यहम् ।। ४-ब्रह्मचर्य ही तप है 'मैं सत्य कहता हूँ कि मृत्यु, व्याधि और बुढ़ापे का नाश करने मोक्ष के प्रधान साधन-तप में भी ब्रह्मचर्य को पहला स्थान है। वाली अमृत के समान औषध ब्रह्मचर्य ही है। ब्रह्मचर्य, मृत्यु रोग और जैन-शास्त्रों में ब्रह्मचर्य सब से उत्तम तप माना गया है। इसका एक बुढ़ापे का नाश करने वाला महान् यज्ञ है।' प्रमाण इस प्रकरण के प्रारम्भ में दिया जा चुका है। प्रश्नव्याकरण सूत्र ३-ब्रह्मचर्य से धर्म-रक्षा में भी कहा हैतात्पर्य यह है कि ब्रह्मचर्य से शरीर स्वस्थ रहता है, जिससे धर्म जम्बू! एत्तो य बंभचेरं तव-नियम-नाण दंसण-चरित्तसम्मत्तविणयमूलं. का पालन होता है। इतना ही नहीं कि ब्रह्मचर्य का पालन करना भी यम-नियम-गुणमप्पहाणाजुत्तं, हिमवन्तमहंत तेयमंत धर्म ही है। यह धर्म का प्रधान अंग एवं धर्म का प्रधान रक्षक है। इसके पसत्थगंभीरथिमियमज्झं। लिए प्रश्रव्याकरण सूत्र में कहा है हे जम्बू! यह ब्रह्मचर्य, उत्तम तप नियम, ज्ञान, दर्शन, चरित्र, पउमसरतलागपालिभूयं, महासगढअरगतुंवभूयं, महानगरपागारक सम्यक्त्व और विनय का मूल है। जिस प्रकार सब पर्वतों में हिमालय वाडफलिहभूयं, रज्जु-पिणद्धो व्चइंदकेऊ, विसद्धगेणगुण संपिणधं, महान् और तेजस्वी है, उसी प्रकार सब तपस्याओं में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ है। जम्मि य भग्गम्मि होइ सहसा सव्वं अन्य ग्रन्थों में भी ब्रह्मचर्य को उत्तम तप माना गया है। वेद संभागमहियचणियकसल्लियपलट्टपडि-यखंडियपरिसडियविणासियं . भी ब्रह्मचर्य को ही तप मानते हैं। जैसेविणयसीलतवनियमगुण-समूहं । शिक्षा-एक यशस्वी दशक विद्वत खण्ड/११ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211474
Book TitleBramhacharya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJawahar Acharya
PublisherZ_Jain_Vidyalay_Granth_012030.pdf
Publication Year2002
Total Pages8
LanguageHindi
ClassificationArticle, Five Geat Vows, C000, & C010
File Size930 KB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy