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________________ चतीन्द्रसूरि स्मारकग्रन्थ - जैन आगम एवं साहित्य से आकर जैन-परम्परा में दीक्षित हुए थे। मेरी दृष्टि में यह नियुक्ति ३. आवश्यकनियुक्ति के बाद दशवैकालिकनियुक्ति और फिर आचारांग के प्रथम अध्ययन और दशवैकालिक के चतुर्थ षड्- उत्तराध्ययननियुक्ति की रचना हुई, यह तो पूर्व चर्चा से सिद्ध हो चुका जीवनिकाय नामक अध्ययन से सम्बन्धित रही होगी और इसका उद्देश्य है। इन तीनों नियुक्तियों की रचना के पश्चात् आचारांगनियुक्ति की रचना बौद्धों के विरुद्ध पृथ्वी, पानी आदि में जीवन की सिद्धि करना रहा हुई है, क्योंकि आचारांगनियुक्ति की गाथा ५ में कहा गया है- 'आयारे होगा। यही कारण है कि इसकी गणना दर्शन-प्रभावक ग्रन्थ में की अंगम्मि य पुव्बुद्दिट्ठा चउक्कयं निक्खेवो'-आचार और अंग के निक्षेपों गयी है। संज्ञी-श्रुत के सन्दर्भ में इसका उल्लेख भी यही बताता है।१२ का विवेचन पहले हो चुका है। २२ दशवैकालिकनियुक्ति में दशवैकालिकसूत्र इसी प्रकार संसक्तनियुक्ति३ नामक एक और नियुक्ति का उल्लेख के क्षुल्लकाचार अध्ययन की नियुक्ति (गाथा ७९-८८) में 'आचार' मिलता है। इसमें ८४ आगमों के सम्बन्ध में उल्लेख है। इसमें मात्र शब्द के अर्थ का विवेचन२२ तथा उत्तराध्ययननियुक्ति में उत्तराध्ययनसूत्र ९४ गाथाएँ हैं। ८४ आगमों का उल्लेख होने से विद्वानों ने इसे पर्याप्त के तृतीय 'चतुरंग' अध्ययन की नियुक्ति करते हुए गाथा १४३-१४४ परवर्ती एवं विसंगत रचना माना है। अत: इसे प्राचीन नियुक्ति-साहित्य में 'अंग' शब्द का विवेचन किया है।२३ अत: यह सिद्ध होता है कि में परिगणित नहीं किया जा सकता है। इस प्रकार वर्तमान नियुक्तियाँ आवश्यक, दशवैकालिक एवं उत्तराध्ययन के पश्चात् ही आचारांगनियुक्ति दस नियुक्तियों में समाहित हो जाती हैं। इनके अतिरिक्त अन्य किसी का क्रम है। नियुक्ति नामक ग्रन्थ की जानकारी हमें नहीं है। इसी प्रकार आचारांग की चतुर्थ विमुक्तिचूलिका की नियुक्ति में 'विमुक्ति' शब्द की नियुक्ति करते हुए गाथा ३३१ में लिखा है कि दस निर्बुक्तियों का रचनाक्रम 'मोक्ष' शब्द की नियुक्ति के अनुसार ही 'विमुक्ति' शब्द की नियुक्ति यद्यपि दसों नियुक्तियाँ एक ही व्यक्ति की रचनायें हैं, फिर भी भी समझना चाहिए।२४ चूँकि उत्तराध्ययन के अट्ठाईसवें अध्ययन की इनकी रचना एक क्रम में हुई होगी। आवश्यकनियुक्ति में जिस क्रम नियुक्ति (गाथा ४९७-९८) में मोक्ष शब्द की नियुक्ति की जा चुकी से इन दस नियुक्तियों का नामोल्लेख है। उसी क्रम से उनकी रचना थी।२५ अत: इससे यही सिद्ध हुआ कि आचारांगनियुक्ति का क्रम हुई होगी, विद्वानों के इस कथन की पुष्टि निम्न प्रमाणों से होती है- उत्तराध्ययन के पश्चात् है। आवश्यकनियुक्ति, दशवैकालिकनियुक्ति, १. आवश्यकनियुक्ति की रचना सर्वप्रथम हुई है, यह तथ्य स्वतः । उत्तराध्ययननियुक्ति एवं आचारांगनियुक्ति के पश्चात् सूत्रकतांगनियुक्ति सिद्ध है, क्योंकि इसी नियुक्ति में सर्वप्रथम दस नियुक्तियों की रचना का क्रम आता है। इस तथ्य की पुष्टि इस आधार पर भी होती है करने की प्रतिज्ञा की गयी है और उसमें भी आवश्यक का नामोल्लेख कि सूत्रकृतांगनियुक्ति की गाथा ९९ में यह उल्लिखित है कि 'धर्म' सर्वप्रथम हुआ है।५ पुनः आवश्यकनियुक्ति से निह्नववाद से सम्बन्धित शब्द के निक्षेपों का विवेचन पूर्व में हो चुका है (धम्मो पुबुद्दिट्ठो)।२६ सभी गाथाएँ (गाथा ७७८ से ७८४ तक) ६ उत्तराध्ययननियुक्ति (गाथा दशवैकालिकनियुक्ति में दशवैकालिकसूत्र की प्रथम गाथा का विवेचन १६४ से १७८ तक) में ली गयी हैं। इससे भी यही सिद्ध होता करते समय 'धर्म' शब्द के निक्षेपों का विवेचन हुआ है। इससे यह है कि आवश्यकनियुक्ति के बाद ही उत्तराध्ययननियुक्ति आदि अन्य सिद्ध होता है कि सूत्रकृतांगनियुक्ति, दशवैकालिकनियुक्ति, के बाद नियुक्तियों की रचना हुई है। आवश्यकनियुक्ति के बाद सबसे पहले निर्मित हुई है। इसी प्रकार सूत्रकृतांगनियुक्ति की गाथा १२७ में कहा दशवैकालिकनियुक्ति की रचना हुई है और उसके बाद प्रतिज्ञागाथा है 'गंथोपुबुद्दिट्ठो'।२८ हम देखते हैं कि उत्तराध्ययननियुक्ति गाथा के क्रमानुसार अन्य नियुक्तियों की रचना की गई। इस कथन की पुष्टि २६७-२६८ में ग्रन्थ शब्द के निक्षेपों का भी कथन हुआ है। २९ इससे आगे दिये गये उत्तराध्ययननियुक्ति के सन्दर्भो से होती है। सूत्रकृतांग नियुक्ति भी दशवैकालिकनियुक्ति एवं उत्तराध्ययननियुक्ति से २. उत्तराध्ययननियुक्ति, गाथा २९ में 'विनय' की व्याख्या करते परवर्ती ही सिद्ध होती है। हुए यह कहा गया है 'विणओ पुव्बुद्दिट्ठा' अर्थात् विनय के सम्बन्ध ४. उपर्युक्त पाँच नियुक्तियों के यथाक्रम से निर्मित होने के पश्चात् में हम पहले कह चुके हैं। इसका तात्पर्य यह है कि उत्तराध्ययननियुक्ति ही तीन छेद सूत्रों यथा—दशाश्रुतस्कंध, बृहत्कल्प एवं व्यवहार सूत्र की रचना से पूर्व किसी ऐसी नियुक्ति की रचना हो चुकी थी, जिसमें पर नियुक्तियाँ भी उनके उल्लेख क्रम से ही लिखी गयीं हैं, क्योंकि विनय सम्बन्धी विवेचन था। यह बात दशवैकालिकनियुक्ति को देखने दशाश्रुतस्कंधनियुक्ति के प्रारम्भ में ही प्राचीनगोत्रीय सकल श्रुत के ज्ञाता से स्पष्ट हो जाती है, क्योंकि दशवैकालिकनियुक्ति में विनय-समाधि और दशाश्रुतस्कंध, बृहत्कल्प एवं व्यवहार के रचयिता भद्रबाहु को नामक नवें अध्ययन की नियुक्ति (गाथा ३०९ से ३२६ तक) में 'विनय' नमस्कार किया गया है। इसमें भी इन तीनों ग्रन्थों का उल्लेख उसी शब्द की व्याख्या है। इसी प्रकार उत्तराध्ययननियुक्ति (गाथा २०७) क्रम से है जिस क्रम से नियुक्ति-लेखन की प्रतिज्ञा में है। अत: में 'कामापुव्वुद्दिट्ठा' कहकर यह सूचित किया गया है कि काम के यह कहा जा सकता है कि इन तीनों ग्रन्थों की नियुक्तियाँ इसी क्रम विषय में पहले विवेचन किया जा चुका है।२० यह विवेचन भी हमें में लिखी गयी होगी। उपर्युक्त आठ नियुक्तियों की रचना के पश्चात् दशवैकालिकनियुक्ति की गाथा १६१ से १६३ तक में मिल जाता ही सूर्यप्रज्ञप्ति एवं इसिभासियाइं की नियुक्ति की रचना होनी थी। इन है।२९ उपर्युक्त दोनों सूचनाओं के आधार पर यह बात सिद्ध होती है दोनों ग्रन्थों पर नियुक्तियाँ लिखी भी गयीं या नहीं, आज यह निर्णय कि उत्तराध्ययननियुक्ति, दशवैकालिकनियुक्ति के बाद ही लिखी गयी। करना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि पूर्वोक्त प्रतिज्ञा-गाथा के अतिरिक्त Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.211279
Book TitleNiryukti Sahitya Ek Punarchintan
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZ_Yatindrasuri_Diksha_Shatabdi_Smarak_Granth_012036.pdf
Publication Year1999
Total Pages15
LanguageHindi
ClassificationArticle & Agam
File Size2 MB
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