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________________ और बुराई का समर्थन नहीं करना चाहिए । ऊपरी मन से अथवा किसी दबाब के कारण भी यदि वह अवगुणों अथवा कुमार्ग का प्रशंसक हो जाता है, तो धीरे-धीरे वह ऐसा अभ्यस्त हो जाता है कि दबाव न होने की स्थिति में भी वह बुरे की प्रशंसा ही करने लग जाता है । वस्तुतः उसे तब बुरे में कोई बुराई दिखाई ही नहीं देगी । परिणामतः स्वयं उसका आचरण भी वैसा ही ( बुरा ) होने लग जाता है । बुराई का समर्थन इस प्रकार मनुष्य के पतन का कारण बन जाता है। बुराई के झूठे समर्थन से भी संसार में उसका प्रसार और शक्ति बढ़ती है | कुमार्ग भी क्षणिक आकर्षण तो रखते ही हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह इस चेटक से स्वयं को अप्रभावित रखे और किसी बुराई को अपने पर हावी नहीं होने दे । जहाँ चौथा अंग बुराई के प्रसार पर रोक लगाता है, वहाँ सम्यग्दर्शन का पाँचवाँ अंग सन्मार्ग के अधिकाधिक प्रसार की प्रेरणा देता है | मनुष्य को चाहिए कि सन्मार्ग की खूब प्रशंसा करे । उसे स्वयं भी सन्मार्गी होना चाहिए और उसे दूसरों को भी ऐसा बनने की प्रेरणा देनी चाहिए । जब कभी सन्मार्ग या अच्छाइयों की निन्दा हो तो उसे उसका प्रतिकार करना चाहिए। अबोधजन अथवा दुर्जन ऐसा व्यवहार कर सकते हैं किन्तु सम्यक दृष्टि जन सदा निर्भीकता के साथ उनका विरोध करते हैं। इस प्रकार लोक में सन्मार्ग का रक्षण करना सम्यग्दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण अंग है । इसी से सम्बद्ध छठा अंग है कि जब कभी मनुष्य स्वयं अथवा कोई अन्य जन सन्मार्ग से च्युत हो रहा हो, तो उसे चाहिए कि उसे दृढ़ बनावे । सन्मार्ग न छोड़ने को प्रेरणा देना और स्वयं भी सन्मार्गी बने रहना इस अंग के अन्तर्गत मनुष्य का कर्त्तव्य है । सम्यग्दर्शन का सातवाँ अंग धर्म के आन्तरिक पक्ष की दृढ़ता के लिए है । इसके अनुसार व्यक्ति Jain Education International को अपने सहधर्मी सहयोगियों के प्रति अतिशय स्नेह रलना चाहिए। यह पारस्परिक स्नेह सभी के मन में धर्म के प्रति रुचि को प्रगाढ़ बनाता है और अन्य जन इस मृदुल व्यवहार एवं स्नेहसिक्त वातावरण से प्रभावित होकर प्रेरणा ग्रहण करते हैं । धर्मानुयायियों के साथ-साथ धर्म के प्रति भी श्रद्धा और स्नेह का भाव होना अनिवार्य है । इसी प्रकार सम्यग्दर्शन का आठवाँ और अन्तिम अंग धर्म के विकास और उसकी विशेषताओं के प्रचार-प्रसार से भी सम्बन्धित है और और अन्य जनों को मिथ्यात्व से मुक्त कर धर्म में प्रवृत्त करने की प्रेरणा देता है । व्यक्ति को जनसाधारण में व्याप्त अज्ञानान्धकार को दूर कर पवित्र, अहिंसामय धर्म का अधिकाधिक प्रसार करने में व्यस्त रहना चाहिए । सम्यग्दृष्टि जन धर्म के विकास में अपना विनीत योगदान करते रहते हैं । ऐसे जन धर्म और धर्मानुयायियों में अन्तर नहीं करते । धर्मप्रेम और धार्मिकों के प्रति प्रेम दोनों परस्पर पर्यायरूप में होते हैं । धार्मिकों का सम्मान करने से ही धर्म का सम्मान किया जा सकता है । धर्म तो सूक्ष्म रूपधारी होता है । उसका यत्किचित् व्यक्त स्वरूप धर्मानुयायियों के रूप में ही हमारे समक्ष आ पाता है । सम्यकदृष्टि जन अत्यन्त कोमल व्यवहार वाले और विनम्र होते हैं । उन्हें अपने तप, साधना, अर्जित क्षमता, उच्चता, वंश, यश आदि का कोई अहं नहीं होता । अहं तो तब आता है, जब व्यक्ति अपने को उच्च और अन्य जनों को इस अपेक्षा में निम्न मानने लगता है । सम्यकदृष्टि जन ऐसा व्यवहार नहीं करते । यह सम्यग्दर्शन स्वतः मोक्ष नहीं है । मोक्ष के मार्ग का अनुसरण करने के लिए यह आवश्यक तैयारी मात्र है । यह वह भूमिका है, जिसके पश्चात् धर्मांकुरण सम्भव हो पाता है । यह व्यवहार व्यक्ति को मोक्ष मार्ग का पथिक बनने की कुसुम अभिनन्दन ग्रन्थ : परिशिष्ट ५४३ साध्वीरत्न ग्रन्थ or Private & Personal Use Only www.jaineerary.org
SR No.211053
Book TitleJainachar Ek Vivechan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajendramuni
PublisherZ_Kusumvati_Sadhvi_Abhinandan_Granth_012032.pdf
Publication Year1990
Total Pages11
LanguageHindi
ClassificationArticle & Achar
File Size2 MB
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