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________________ -यतीन्द्रसूरि स्मारक ग्रन्थ - समाज एवं संस्कृति - गया । किन्तु दूसरी ओर पुरुष के सम्बन्ध में बहुपत्नी प्रथा की स्पष्ट प्रथा का उद्देश्य तो वासना में आकण्ठ डूबना है जो निवृत्तिप्रधान जैनधर्म अवधारणा आगमों और आगमिक व्याख्या-साहित्य में मिलती है। इनमें की मूल भावना के अनुकूल नहीं है । जैन ग्रन्थों में जो बहुपत्नी प्रथा की ऐसे अनेक सन्दर्भ हैं जहाँ पुरुषों को बहुविवाह करते दिखाया गया है। उपस्थिति के संकेत मिलते हैं वे उस युग की सामाजिक स्थिति के दुःख तो यह है कि उनकी इस प्रवृत्ति की समालोचना भी नहीं की गई सूचक हैं । आगम-साहित्य में पार्श्व, महावीर एवं महावीर के नौ प्रमुख है । अत: उस युग में जैनाचार्य इस सम्बन्ध में तटस्थ भाव रखते थे, उपासकों की एक-एक पत्नी मानी गई है। यही कहा जा सकता है। क्योंकि किसी जैनाचार्य ने बहुविवाह को अच्छा कहा हो, ऐसा भी कोई सन्दर्भ नहीं मिलता है। उपासकदशा में श्रावक विधवा-विवाह एवं नियोग के स्वपत्नीसन्तोषव्रत के अतिचारों का उल्लेख मिलता है, उसमें यद्यपि आगमिक व्याख्या साहित्य में नियोग और विधवा'परविवाहकरण' को अतिचार या दोष माना गया है । ५३ 'परविवाहकरण' विवाह के कुछ सन्दर्भ उपलब्ध हो जाते हैं किन्तु हमें यह स्मरण रखना की व्याख्या में उसका एक अर्थ दूसरा विवाह करना बताया गया है अत: चाहिए कि यह भी जैनाचार्यों द्वारा समर्थित नहीं है । निशीथचूर्णि में एक हम इतना अवश्य कह सकते हैं कि जैनों का आदर्श एकपत्नीव्रत ही राजा को अपनी पत्नी से नियोग के द्वारा सन्तान उत्पन्न करवाने के सन्दर्भ में यह कहा गया है कि जिस प्रकार खेत में बीज किसी ने भी डाला हो बहुपत्नी प्रथा के आविर्भाव पर विचार करें तो हम पाते हैं कि फसल का अधिकारी भूस्वामी ही होता है। उसी प्रकार स्वस्त्री से उत्पन्न यौगलिक-काल तक बहुपत्नी प्रथा प्रचलित नहीं थी । आवश्यकचूर्णि सन्तान का अधिकारी उसका पति ही होता है ।५५ यह सत्य है कि एक के अनुसार सर्वप्रथम ऋषभदेव ने दो विवाह किये थे। किन्तु उनके लिए युग में भारत में नियोग की परम्परा प्रचलित रही किन्तु निवृत्तिप्रधान दूसरा विवाह इसलिए आवश्यक हो गया था कि एक युगल में पुरुष जैनधर्म ने न तो नियोग का समर्थन किया, न ही विधवा-विवाह का । की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण उस स्त्री को सुरक्षा प्रदान करने की क्योंकि उसकी मूलभूत प्रेरणा यही रही कि जब भी किसी स्त्री या पुरुष दृष्टि से यह आवश्यक था । किन्तु जब आगे चलकर स्त्री को एक को कामवासना से मुक्त होने का अवसर प्राप्त हो वह उससे मुक्त हो सम्पत्ति के रूप में देखा जाने लगा तो स्वाभाविक रूप से स्त्री के प्रति जाय । जैन आगम एवं आगमिक व्याख्याओं में हजारों सन्दर्भ प्राप्त होते अनुग्रह को भावना के आधार पर नहीं, अपितु अपनी कामवासनापूर्ति हैं जहाँ पति की मृत्यु के पश्चात् विधवायें भिक्षुणी बनकर संघ की शरण और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए बहुविवाह की प्रथा आरम्भ हो गयी। में चली जाती थी। जैन संघ में भिक्षुणियों की संख्या के अधिक होने यहाँ हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि यद्यपि समाज में बहुविवाह की का एक कारण यह भी था कि भिक्षुणी-संघ विधवाओं के सम्मानपूर्ण प्रथा प्रचलित थी किन्तु इसे जैनधर्म-सम्मत एक आचार मानना अनुचित एवं सुरक्षित जीवन जीने का आश्रयस्थल था । यद्यपि कुछ लोगों के द्वारा होगा। क्योंकि जब जैनों में विवाह को ही एक अनिवार्य धार्मिक कर्त्तव्य यह कहा जाता है कि ऋषभदेव ने मृत युगल पत्नी से विवाह करके के रूप में स्वीकार नहीं किया गया तो बहुविवाह को धार्मिक कर्त्तव्य विधवा-विवाह की परम्परा को स्थापित किया था। किन्तु आवश्यक के रूप में स्वीकार करने का प्रश्न ही नहीं उठता । जैन-आगम और चूर्णि से स्पष्ट होता है कि वह स्त्री मृत युगल की बहन थी, पत्नी नहीं। आगमिक व्याख्या-साहित्य में यद्यपि पुरुष के द्वारा बहुविवाह के अनेक क्योंकि उस युगल में पुरुष की मृत्यु बालदशा में हो चुकी थी । अत: सन्दर्भ उपलब्ध होते हैं किन्तु हमें एक भी ऐसा सन्दर्भ नहीं मिलता जहाँ इस आधार पर विधवा-विवाह का समर्थन नहीं होता है । जैनधर्म जैसे कोई व्यक्ति गृहस्थोपासक के व्रतों को स्वीकार करने के पश्चात् बहुविवाह निवृत्तिप्रधान धर्म में विधवा-विवाह को मान्यता प्राप्त नहीं थी । यद्यपि करता है । यद्यपि ऐसे सन्दर्भ तो हैं कि मुनिव्रत या श्रावकव्रत स्वीकार भारतीय समाज में ये प्रथाएँ प्रचलित थीं, इससे इन्कार नहीं किया जा करने के पूर्व अनेक गृहस्थोपासकों की एक से अधिक पत्नियाँ थी। सकता है । किन्तु व्रत स्वीकार करने के पश्चात् किसी ने अपनी पत्नियों की संख्या में वृद्धि की हो, ऐसा एक भी सन्दर्भ मुझे नहीं मिला । आदर्श स्थिति विधुर-विवाह तो एकपत्नी प्रथा को ही माना जाता था । उपासकदशा में १० प्रमुख जब समाज में बहु-विवाह को समर्थन हो तो विधुर-विवाह को उपासकों में केवल एक की ही एक से अधिक पत्नियाँ थीं । शेष सभी मान्य करने में कोई आपत्ति नहीं होगी । किन्तु इसे जैनधर्म में धार्मिक को एक-एक पत्नी थी साथ ही उसमें श्रावकों के व्रतों के जो अतिचार दृष्टि से समर्थन प्राप्त था, यह नहीं कहा जा सकता । पत्नी की मृत्यु बताये गये हैं उनमें स्वपत्नीसन्तोष व्रत का एक अतिचार 'परविवाहकरण' के पश्चात् आदर्श स्थिति तो यही मानी गई थी कि व्यक्ति वैराग्य ले है।५३ यद्यपि कुछ जैनाचार्यों ने 'परविवाहकरण' का अर्थ स्व-सन्तान के ले । मात्र यही नहीं अनेक स्थितियों में पति, पत्नी के भिक्षुणी बनने पर अतिरिक्त अन्यों की सन्तानों का विवाह-सम्बन्ध करवाना माना है किन्तु स्वयं भी भिक्षु बन जाता है । यद्यपि सामाजिक जीवन में विधुर-विवाह उपासक-दशांग की टीका में आचार्य अभयदेव ने इसका अर्थ एक से के अनेक प्रसंग उपलब्ध होते हैं जिनके संकेत आगमिक व्याख्याअधिक विवाह करना माना है । अत: हम यह कह सकते हैं कि साहित्य में मिलते हैं। धार्मिक आधार पर जैनधर्म बहपत्नी-प्रथा का समर्थक नहीं है । बहपत्नी Jain Education International For Private & 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SR No.210772
Book TitleJain Dharm me Nari ki Bhumika
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZ_Vijyanandsuri_Swargarohan_Shatabdi_Granth_012023.pdf
Publication Year1999
Total Pages20
LanguageHindi
ClassificationArticle & Jain Woman
File Size3 MB
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