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________________ 10.30 6.0000000 80-%A6000 8868800300 | अध्यात्म साधना के शास्वत स्वर 497 97 00000000000 आधुनिक विज्ञान में भी दिक् में पदार्थ वितरित है और दो है। असल में, सूर्य-चंद्र-ग्रह की गति के कारण इस काल को वस्तुओं के बीच जो दूरी है, वह ही दिक् है। इसी प्रकार ‘परत्व' / विभाजित किया जाता है जो काल का वह रूप है जिसे हम और 'अपरत्व' अर्थात् पहले और बाद में होना भी मूलतः काल के व्यावहारिक काल की संज्ञा देते हैं, इसे ही मानवीय काल कहा जा द्वारा ही प्रत्यक्षीकृत होता है। विज्ञान में पूर्व और पश्चात् का मापन सकता है जिसके द्वारा हम काल या काल-खण्डों (भूत, वर्तमान, गणितीय सूत्रों के द्वारा होता है। भाषिक व्यापार एवं चिंतन में पल, घंटे आदि) का अनुभव या प्रत्यक्षीकरण करते हैं। भाषा के घटक जैसे क्रिया, संज्ञा, सर्वनाम, भूत वर्तमान और ___ जैनाचार्यों ने इस सूक्ष्मातिसूक्ष्म समय को समझाने के लिए भविष्य परोक्ष रूप से दिक्-काल का निबंधन करते हैं। क्रिया-पद / रेशमी वस्त्र या साड़ी का उदाहरण दिया है। कोई भी दर्जी एक मूलतः घटना का द्योतन करते हैं और इस प्रकार घटना और क्रिया वस्त्र को एक ही बार में फाड़ डालता है, इस फाड़ने में जितना का एक सापेक्ष सम्बन्ध होता है। (देखे मेरा लेख "भाषा चिंतन में काल व्यतीत होता है, इसमें असंख्यात 'समय' बीत जाते हैं। वस्त्र दिक्-काल सकतन, आलोचना 83) / क्रिया एक तरह से तंतुओं का बना होता है, अतः ऊपर का तंतु पहले और नीचे का कालवाचक स्थितियों (भूत, वर्तमान आदि) का ही संकेत है। ये तंतु बाद में विदीर्ण होता है। इस प्रकार, अनन्त तंतुओं का संघात घटनाएँ क्रियापदों द्वारा एक तार्किक व्यवस्था प्राप्त करती हैं। होता है और अनंत संघातों का एक समुदाय। ऐसे अनंत समुदायों क्रिया का मूल गुण है गति और काल की वैज्ञानिक अवधारणा से तंतु का ऊपरी रूप बनता है। इस प्रकार छेदन क्रमशः होता है। गति सापेक्ष है। इस प्रकार जैन-दर्शन में काल ही सारी क्रियाओं, इस छेदन में जितना समय लगता है, उसका अत्यन्त सूक्ष्म अंश घटनाओं तथा प्रक्रमों (प्रोसेस) का सहकारी तत्त्व है। यह एक ऐसा अर्थात् असंख्यातवाँ भाग 'समय' कहलाता है। सत्य है जो विज्ञान, भाषा-चिन्तन और वैशेषिक-चिंतन में किसी न / यदि गहराई से देखा जाएँ तो समय का इतना सूक्ष्म परिणाम किसी रूप में प्राप्त होता है। भर्तृहरि ने भाषिक स्तर पर क्रिया, बुद्धिग्राह्य नहीं है, लेकिन दूसरी ओर यह भी सत्य है कि आधुनिक घटना, काल और अंतरालों का जो विवेचन किया है, वह मेरी विज्ञान ने आणविक कालमान के प्रयोग के द्वारा 'समय' का दृष्टि से वाक्-शक्ति के वृहद एवं अर्थवान् रूप को प्रस्तुत करता है। निर्धारण इतनी बारीकी से किया है कि उसमें त्रुटि की संभावना इस बिन्दु पर आकर 'कालाणु' की धारणा पर विचार अपेक्षित 30 हजार वर्षों में एक सेकेंड से भी कम है। इधर वैज्ञानिक है जो जैन-दर्शन की अपनी एक विशेष धारणा है। जैनदर्शन की / हाइड्रोजन घड़ी भी विकसित कर रहे हैं। जिसमें शुद्धता की त्रुटि मान्यता यह है कि काल असंख्य कालाणुओं से भरा है अर्थात् काल / की सम्भावना और भी कम हो जाएगी अर्थात् तीन करोड़ वर्षों के की 'संरचना' में कालाणुओं का संघात है। यह कालाणु एक बिन्दु है / अंदर एक सेकेंड से भी कम। अतः आणविक घड़ी नी अरब उन्नीस और वह भी आकाश या स्पेस में जिसे जैन चिन्तन में "प्रदेश" की / करोड़ के लगभग भाग तक समय को संकेतित करने में सक्षम है। संज्ञा दी गयी है। दिगम्बर परम्परा में (गोम्मटसार जीवकाण्ड) अतः असंख्यात समय की धारणा सत्य है। “एगपदेशो अणुस्सहते” तथा “लोकपदेशप्पमा कालो" जैसे कथन प्रसिद्ध विज्ञान-दार्शनिक इनिंगटन का मानना है कि “इस इस बात को स्पष्ट करते हैं कि “लोकाकाश के एक-एक प्रदेश में आणविक युग में एक मिनट का सौवाँ भाग मूलतः 'अनंतता' का एक-एक अणु स्थित है। इससे यह स्पष्ट होता है कि द्रव्य (पुद्गल) द्योतक है।" यदि सौवाँ हिस्सा अनंतता का संकेत है तो उपर्युक्त का एक-एक अणु प्रदेश में स्थित रहता है। असंख्यात समयों की स्थिति जो कहीं अधिक सूक्ष्म है, इसकी वैज्ञानिक शब्दावली में इसे “स्पेस प्वाईट" (दिक्-बिंदु) कहते कल्पना की जा सकती है। हैं जो दिक् में पदार्थ के वितरण से सम्बन्धित है। यहाँ पर दिक् कहने का तात्पर्य यह है कि जैन-दर्शन ने 'समय' की और काल का सापेक्ष सम्बन्ध है, उन्हें एक दूसरे से अलग करके अवधारणा के द्वारा 'काल' के उस सूक्ष्म रूप की “गणना" का नहीं देखा जा सकता है। उपनिषद् की शब्दावली में कहें तो यह मार्ग प्रशस्त किया है जिसकी ओर विज्ञान और गणित क्रमशः दिक्-काल का “युगनद्ध" रूप है। (स्टेडी आफ टाइम एण्ड स्पेस अग्रसर हो रहे हैं। इन इंडियन थाट, के. मंडल, पृ. 32) इसी गणना से सम्बंधित जैन-दर्शन में संख्येय और असंख्येय जहाँ तक काल का सम्बन्ध है जैन-आचार्यों ने एक महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध की ओर संकेत किया है, यह सम्बन्ध है काल और समय काल की गणना की गयी है। जो काल सूर्य गति की सापेक्षता में का। अक्सर हम काल और समय को पर्यायवाची मान लेते हैं मापा जाता है (यथा-दिन, रात, मुहूर्त, क्षण, युग आदि) वह जबकि जैन-दार्शनिकों ने इनके मध्य सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट किया है।। लौकिक काल है जिसे संख्येय काल की संज्ञा दी गयी है। यह काल जैन-दर्शन में समय, आवलिका आदि काल के सूक्ष्म विभाग हैं।। का राशि रूप भी है जिसके द्वारा विज्ञान में गणना की जाती है। काल का सबसे छोटा अंश जिसका विखंडन संभव न हो सके, वह दूसरा वह काल है जो गणना से परे है, उसे या तो रूपक या 'समय' कहा जाता है। असंख्यात समयों की एक आवलिका होती / उपमान के द्वारा संकेतित किया जाता है; उसे असंख्येय काल कहा ORDDHARY TRAPARICRemedies 0.0000000 GODARA VOODO N ARGISORIN 300:00:09340oYOUloo00:00:0908 0320A30
SR No.210684
Book TitleJain Darshan me Kal ki Avadharna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVirendrasinh
PublisherZ_Nahta_Bandhu_Abhinandan_Granth_012007.pdf
Publication Year
Total Pages1
LanguageHindi
ClassificationArticle & Six Substances
File Size3 MB
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