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________________ -यतीन्द्रसूरिस्मारक ग्रन्थ - जैन साधना एवं आचारप्रायोपगमन। उसमें समाधिमरण के लिए दो तथ्य आवश्यक माने गए समाधिमरण ग्रहण करे इसका उल्लेख करते हुए आचाराङ्गकार कहता हैं- पहला कषायों का कृशीकरण और दूसरा शरीर का कृशीकरण। है कि ऐसे भिक्षु ग्राम, नगर, कर्वट, आश्रम आदि में जाकर घास इसमें भी मुख्य उद्देश्य तो कषायों का कृशीकरण है। भक्तपरिज्ञा में की याचना करे और उसे प्राप्त कर गाँव के बाहर एकांत में जाकर प्रथम तो मुनि के लिए कल्प का विचार किया गया है और उसके जीव-जन्तु, बीज, हरित आदि से रहित स्थान को देखकर घास का अन्त में यह बताया गया है कि अकल्प का सेवन करने की अपेक्षा बिस्तर तैयार करे और उस पर स्थित होकर इत्वरिक अनशन अथवा शरीर का विसर्जन कर देना ही उचित है। उसमें कहा गया है कि प्रायोपगमन स्वीकार करे। जब भिक्षु को यह अनुभव हो कि मेरा शरीर अब इतना दुर्बल अथवा ज्ञातव्य है कि आचाराङ्गकार भक्तप्रत्याख्यान, इङ्गितिमरण और रोग से आक्रान्त हो गया है कि गृहस्थों के घर भिक्षा हेतु परिभ्रमण प्रायोपगमन ऐसे तीन प्रकार के समाधिमरण का उल्लेख करता है। करना मेरे लिए सम्भव नहीं है, साथ ही मुझे गृहस्थ के द्वारा मेरे सम्मुख भक्तप्रत्याख्यान में मात्र आहारादि का त्याग किया जाता है, किन्तु लाया गया आहार आदि ग्रहण करना योग्य नहीं है। ऐसी स्थिति में शारीरिक हलन-चलन और गमनागमन की कोई मर्यादा निश्चित नहीं एकाकी साधना करने वाले जिनकल्पी मुनि के लिए आहार का त्याग की जाती है। इङ्गितमरण में आहार-त्याग के साथ ही साथ शारीरिक करके संथारा ग्रहण करने का विधान है। यद्यपि आचाराङ्गसूत्र के हलन-चलन और गमनागमन का एक क्षेत्र निश्चित कर लिया जाता अनुसार संघस्थ मुनि की बीमारी अथवा वृद्धावस्थाजन्य शारीरिक है और उसके बाहर गमनागमन का त्याग कर दिया जाता है। प्रायोपगमन दुर्बलता की स्थिति में आहारादि से एक-दूसरे का उपकार अर्थात् सेवा या पादोपगमन में आहार आदि के त्याग के साथ-साथ शारीरिक क्रियाओं कर सकते हैं, किन्तु इस सम्बन्ध में भी चार विकल्पों का उल्लेख का निरोध करते हुए मृत्यु-पर्यन्त निश्चल रूप से लकड़ी के तख्ने के हुआ है - समान स्थिर पड़े रहना पड़ता है। इसीलिए आचाराङ्गकार ने प्रायोपगमन १. कोई भिक्षु यह प्रतिज्ञा करता है कि मैं (साधर्मिक भिक्षुओं के संथारे के प्रत्याख्यान में स्पष्ट रूप से यह लिखा है कि काय, योग लिए) आहार आदि लाऊँगा और (उनके द्वारा) लाया हुआ स्वीकार एवं ईर्या का प्रत्याख्यान करे। वस्तुतः यह तीनों संथारे की क्रमिक भी करूंगा। अवस्थाएँ हैं। अथवा २. कोई यह प्रतिज्ञा करता है कि मैं (दूसरों के लिए) आहार आदि आचाराणसूत्र में समाधिमरण का विवरण नहीं लाऊँगा, किन्तु (उनके द्वारा) लाया हुआ स्वीकार करूँगा। क्रम से निर्ममत्व की स्थिति को प्राप्त धैर्यवान्, आत्मनिग्रही और अथवा गतिमान साधक इस अद्वितीय समाधिमरण की साधना हेतु तत्पर हो। ३. कोई भिक्षु यह प्रतिज्ञा करता है कि मैं (दूसरों के लिए) आहार वह धर्म के पारगामी ज्ञानपूर्वक अनुक्रम से दोनों ही प्रकार के आरम्भ आदि लाऊँगा, किन्तु उनके द्वारा लाया स्वीकार नहीं करूंगा। का (हिंसा का) परित्याग कर दे। वह कषायों को कृश करते हुए आहार अथवा की मात्रा को भी अल्प करे और परिषहों को सहन करे। इस प्रकार ४. कोई भिक्षु यह प्रतिज्ञा करता है कि मैं न तो (दूसरों के लिए) करते हुए जब अति ग्लान हो जाय तो आहार का भी त्याग कर दे। आहार आदि लाऊँगा और न (उनके द्वारा) लाया हुआ स्वीकार ऐसी स्थिति में न तो जीवन की आकांक्षा रखे और न मरण की, करूँगा। अपितु जीवन एवं मरण दोनों में ही आसक्त न हो। वह निर्जरापेक्षी उपरोक्त चार विकल्पों में से जो भिक्षु प्रथम दो विकल्प स्वीकार मध्यस्थ समाधि-भाव का अनुपालन करे तथा राग-द्वेष आदि आन्तरिक करता है, वह आहारादि के लिए संघस्थ मुनियों की सेवा ले सकता परिग्रह और शरीर आदि बाह्य परिग्रह का त्याग कर शुद्ध अध्यात्म है। किन्तु जो अन्तिम दो विकल्प स्वीकार करता है, उसके लिए आहारादि का अन्वेषण करे।। के लिये दूसरों की सेवा लेने में प्रतिज्ञा-भङ्ग का दोष आता है। ऐसी यदि उसे अपने साधनाकाल में किसी भी रूप में आयुष्य के स्थिति में आचाराङ्गकार का मन्तव्य यही है कि प्रतिज्ञा भङ्ग नहीं करनी विनाश का कोई कारण जान पड़े, तो वह शीघ्र ही समाधिमरण का चाहिये, भले ही भक्तप्रत्याख्यान कर देह त्याग करना पड़े। आचाराङ्गकार प्रयत्न करे। ग्राम अथवा अरण्य में जहाँ हरित एवं प्राणियों आदि का के अनुसार ऐसी स्थिति में जब भिक्षु को यह संकल्प उत्पन्न हो कि अभाव (अल्पता) हो, उस स्थण्डिल भूमि पर तृण का बिछौना तैयार मैं इस समय संयम-साधना के लिए इस शरीर को वहन करने में ग्लान करे और वहाँ निराहार होकर शान्त भाव से लेट जाये। मनुष्य कृत (असमर्थ) हो रहा हूँ, तब वह क्रमशः आहार का संवर्तन (संक्षेप) अथवा अन्य किसी प्रकार के परीषह से आक्रान्त होने पर भी मर्यादा करे। आहार का संक्षेप कर कषायों (क्रोध, मान, माया और लोभ) का उल्लङ्घन न करे तथा परिषहों को समभावपूर्वक सहन करे। आकाश को कृश करे। कषायों को कृश कर समाधिपूर्ण भाव वाला शरीर और में विचरण करने वाले पक्षी एवं रेंगने वाले प्राणी यदि उसके शरीर कषाय दोनों ओर से कृश बना हुआ वह भिक्षु फल का वस्थित हो का मांस नोंचें, रक्त पीयें तो भी न उन्हें मारे और न उनका निवारण समाधिमरण के लिए उत्थित (प्रयत्नशील) होकर शरीर का उत्सर्ग करे। करे तथा न उस स्थान से उठकर अन्यत्र जाये, अपितु यह विचार संथारा ग्रहण करने का निश्चय कर लेने के पश्चात् वह किस प्रकार करे कि ये प्राणी मेरे शरीर का ही नाश कर रहे हैं, मेरे ज्ञानादि गुणों Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210583
Book TitleJain Agamo me Samadhimaran ki Avadharna
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZ_Vijyanandsuri_Swargarohan_Shatabdi_Granth_012023.pdf
Publication Year1999
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Agam
File Size956 KB
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