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________________ है, जो ग्रन्थियां सुलझती नहीं है, वे भी इन सूक्ष्म उच्चारणों से के द्वारा अल्पसमय में हीरा काटा जाता है। शब्दों की सूक्ष्म सुलझ जाती है। ध्वनि से वस्त्रों की धुलाई होती है। मकान के बंद द्वार, फाटक निष्कर्ष यह है कि जब हमारा संकल्प सहित मंत्रजप भी आवाज से खुलते और पुन: आवाज से बंद हो जाते हैं। यह स्थूलवाणी से होगा, तो इतना पावरफुल नहीं होगा, न ही हम यथेष्ट । है शब्दशक्ति का चमत्कार। जप में शब्द शक्ति का ही लाभ प्राप्त कर सकेंगे, हमारा जप तभी शक्तिशाली और चमत्कार है। लाभदायी होगा, जब हमारा संकल्पयुक्त जप सूक्ष्म वाणी से होगा। अश्राव्य शब्द के आघात का चमत्कार भावना, शुद्ध उच्चारण और तरंगों से मंत्रजप शक्तिशाली एक क्रम, सरीखी गति से सतत किए जाने वाले सूक्ष्म, एवं लाभदायी अश्राव्य शब्द के आघात का चमत्कार वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं मंत्र शक्तिशाली और अभीष्ट फलदायी तभी होता है, जब में देखा जा चुका है। इसी प्रकार प्रयोगकर्ताओं ने अनुभव करके मंत्र के शब्दों के साथ भावना शुभ और उच्चारण शद्ध होता है। बताया है कि एक टन भारी लोहे का गार्डर किसी छत के बीच उससे विभिन्न तरंगें पैदा होती जाती हैं। अत: मंत्रों की। में लटका कर उस पर सिर्फ ५ ग्राम वजन के कार्क का . शब्दशक्ति के साथ तीन बातें जुड़ी हुईं १. भावना, २. उच्चारण लगातार शब्दाघात एक क्रम व गति से कराया जाए तो कुछ और ३. उच्चारण से उत्पन्न हुई शक्ति के साथ पैदा होने वाली ही समय के पश्चात् लोहे का गार्डर कांपने लगता है। पुलों पर तरंगें। किसी शब्द के उच्चारण से अल्फा तरंगे, किसी शब्द के से गुजरती सेना के लेफ्ट-राइट के ठीक क्रम से तालबद्ध पैर उच्चारण से थेटा या बेटा तरंगें पैदा होती हैं। ॐ के भावनापूर्वक पड़ने से उत्पन्न हुई एकीभूत शक्ति के प्रहार से मजबूत से उच्चारण से अल्फा तरंगे पैदा होती है, जो मस्तिष्क को प्रभावित मजबूत पुल भी टूटकर मिट सकता है। इसलिए सेना को पैर एवं शिथिलीकरण करती हैं। ॐ ह्रीं, श्री, क्लीं, ब्लू, ए, अर्हम्, मिलाकर पुल पर चलने से मना कर दिया जाता है। मंत्रजप के अ सि आ उ सा आदि जितने भी मंत्र या बीजाक्षर हैं, उनसे क्रमबद्ध उच्चारण से इसी प्रकार का तालक्रम उत्पन्न होता है। उत्पन्न तरंगे ग्रंथि संस्थान को प्रभावित करती हैं तथा अन्त:स्रावी मंत्रगत शब्दों के लगातार आघात से शरीर के अंत:स्थानों में ग्रन्थियों को संन्तुलित एवं व्यवस्थित करती है। विशिष्ट प्रकार की हलचलें उत्पन्न होती हैं, जो आन्तरिक मंत्र जप के लिए शब्दों का चयन विवेकपूर्वक हो मूर्च्छना को दूर करती हैं एवं सुषुप्त आन्तरिक क्षमताओं को जागृत कर देती है। जैनाचार्यों ने वाक्सूक्ष्मत्व, वाग्गुप्ति तथा भाषासमिति का जप के साथ योग शब्द जोड़ने के पीछे आशय ध्यान रखते हुए उन शब्दों का चयन किया है जो मंत्ररूप बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि साधक को यतनापूर्वक उन शब्दों का जप के साथ योग शब्द जोड़कर अध्यात्मनिष्ठों ने यह चुनाव करना चाहिए, जिनसे बुरे विकल्प रुक जाएं, जो उसकी संकेत किया है कि जप उन्हीं शब्दों और मंत्रों का किया जाए, संयम यात्रा को विकासशील और स्व-पर कल्याणमय बनाएं एवं जो आध्यात्मिक विकास के प्रयोजन को सिद्ध करता हो, जिससे विघ्नबाधाओं से बचाएँ। जीवन में सुगन्ध भर जाए, दुर्गन्ध मिट व्यक्ति में परमात्मा या मोक्ष रूप ध्येय की प्रति तन्मयता, जाए, जीवन मोक्ष के श्रेयस्कर पथ की ओर गति प्रगति करे, प्रेय एकाग्रता, तल्लीनता एवं दृढ़निष्ठा जगे, आंतरिक, सुषुप्त के पथ से हटे, उसी प्रकार से संकल्प एवं स्वप्न हृदयभूमि में शक्तियां जगेता, जपयोग में मंत्रशक्ति के इसी आध्यात्मिक प्रादुर्भूत हों, जिनसे आत्म स्वरूप में या परमात्मभाव में रमण हो प्रभाव का उपयोग किया जाता है तथा आत्मा में निहित ज्ञानसके, परभावों और विभावों से दूर रहा जा सके। “णमो दर्शन-चारित्र सुख (आनंद) आत्मबल आदि शक्तियों को अरिहंताणं" आदि पंचपरमेष्ठी नमस्कार मंत्र तथा नमो नाणस्स, अभिव्यक्त करने का पुरुषार्थ किया जाता है। नमो दंसणस्स, नमो चरित्तस्स और नमो तवस्स" आदि नवपद नामजप से मन को प्रशिक्षित करने हेतु चार भूमिकाएँ ऐसे शक्तिशाली शब्दों का संयोजन है। भावना और श्रद्धा के नाम जप से मन को प्रशिक्षित करने हेतु मनोविज्ञान शास्त्र साथ उनके उच्चारण (जप) से आधि-व्याधि और उपाधि मिट में चार स्तर बताए हैं, १. लर्निंग का अर्थ बार-बार स्मरण कर अन्तरात्मा में समाधि प्राप्त हो सकती है। करना, दोहराना है। इस भूमिका में पुनरावृत्ति का आश्रय लिया शब्दशक्ति का चमत्कार जाता है। दूसरी परत हैं रिटेंसन अर्थात् प्रस्तुत जानकारी या पहले बताया जा चुका है कि शब्द शक्ति के द्वारा विविध कार्यप्रणाली को स्वभाव का अंग बना लेना। तीसरी भूमिका हैरोगों की चिकित्सा होती है। अब तो शब्द की सूक्ष्म तरंगों के - रिकॉल, उसका अर्थ है - भूतकाल की उस संबंध में अच्छी द्वारा ऑपरेशन होते हैं, चीर-फाड़ होती है। ध्वनि की सूक्ष्म तरंगों बातों को पुन: स्मृतिपथ पर लाकर सजीव कर लेना, चौथी भूमिका है रिकाम्बिशन अर्थात् उसे मान्यता प्रदान कर देना, उसे ० अप्टदशी / 2130 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.210508
Book TitleJapayoga ki Vilakshan Shakti
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPushkar Muni
PublisherZ_Ashtdashi_012049.pdf
Publication Year2008
Total Pages7
LanguageHindi
ClassificationArticle & Mantra Tantra
File Size758 KB
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