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रानीन्दसरि स्मारक सत्य की हत्या करने वाले व्यक्ति की अपेक्षा अधिक दोषी मानना होगा। क्योंकि पर्यावरण के प्रदूषण का परिणाम केवल एक व्यक्ति तक सीमित न होकर सम्पूर्ण मानवता या प्राणिजगत् पर होता है।
जीवन जीने का नियम संघर्ष नहीं, सहकार : एकमात्र समाधान
पर्यावरण के प्रदूषण की समस्या उत्पन्न होने का मूलभूत कारण यह था कि मनुष्य ने जीवन के विविध रूपों को मानवीय जीवन का एक साधन मान लिया था। वह यह मानने लगा था कि मनुष्य का जीवन न केवल सर्वश्रेष्ठ है, अपितु उसे अपनी सुख-सुविधाओं के लिए जीवन के दूसरे रूपों को नष्ट करने का अधिकार भी है। पाश्चात्य विकासवादियों ने जीवन का नियम 'अस्तित्व के लिए संघर्ष' और 'योग्यतम की विजय' प्रतिपादित किया था, जो एक मिथ्या धारणा पर आधारित है। यह सत्य है कि जीवन का संरक्षण और विकास जीवन के दूसरे रूपों पर आधारित होता है, किन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य को जीवन के दूसरे रूपों को नष्ट करने का खुला अधिकार है। यह सत्य है कि मानवीय जीवन का सर्वश्रेष्ठ रूप है किन्तु इसका अर्थ यह भी नहीं है कि मनुष्य को जीवन के दूसरे रूपों को नष्ट करने का खुला अधिकार है। जैन दार्शनिक यह तो स्वीकार करते हैं कि एक जीवन जीवन के दूसरे रूपों पर अपने अस्तित्व के लिए निर्भर है, फिर भी उनके अनुसार 'जीवन का नियम संघर्ष नहीं सहकार' है। जहाँ पाश्चात्य विकासवादी ने संघर्ष को जीवन का नियम बताया है, वहाँ जैन- दार्शनिकों ने सहकार को जीवन का नियम बताया है। जैन- दार्शनिकों के अनुसार विकास की प्रक्रिया संघर्ष में नहीं, सहयोग पर निर्भर है। जैनदार्शनिक उमास्वाति ने आज से २००० वर्ष पूर्व तत्त्वार्थसूत्र में एक सूत्र दिया था “परस्परोपग्रहोजीवानाम्" । जिसका तात्पर्य है एक दूसरे का सहयोग करना ही जीवन का नियम है । जीवनयात्रा पारस्परिक सहयोग के सहारे चलती है। हम जीवन के दूसरे रूपों का विनाश करके अपने अस्तित्व को सुरक्षित नहीं रख सकते। व्यवहार में भी हम देखते है कि जहाँ मनुष्य का जीवन पेड़पौधों पर आश्रित है, वहीं पेड़-पौधों का जीवन मनुष्य एवं अन्य प्राणियों पर निर्भर है। वे मनुष्य एवं दूसरे प्राणियों की श्वांस से निकली कार्बन डाइआक्स आइड को ग्रहण कर उसके
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आधुनिक सन्दर्भ में जैनधर्म
बदले में आक्सीजन निःसृत करते हैं, जिससे प्राणियों का जीवन चलता है। पेड़-पौधों के द्वारा मनुष्य और दूसरे शाकाहारी प्राणियों को भोजन प्राप्त होता है और उन प्राणियों से निकले मल-मूत्र पेड़-पौधे अपना भोजन ग्रहण करते हैं। पेड़-पौधे हमें आहार और प्राण वायु प्रदान करते हैं और हम पेड़-पौधों को आहार और प्राणवायु प्रदान करते हैं। इस प्रकार जीवन का चक्र संघर्ष नहीं सहकार पर निर्भर है। आगामी सदी में हमें जैन - आचार्यों के द्वारा दी गई इस जीवन-दृष्टि को अपनाना होगा, तभी हम मानवता का और जीवन के विविध रूपों का संरक्षण कर सकेंगे।
निःशस्त्रीकरण : युग की अनिवार्यता
आत्मसुरक्षा के नाम पर हिंसक अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण एवं संग्रह की वृत्ति अतिप्राचीन काल से ही चली आ रही है। मनुष्य ने अस्त्र-शस्त्रों का विकास अपने अस्तित्व के संरक्षण एवं भय से विमुक्ति के लिए किया था । किन्तु अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण एवं संग्रह की यह वृत्ति मनुष्य में आज तक अभय का विकास नहीं कर सकी है। आज अस्त्र-शस्त्रों के संग्रह की इस वृत्ति ने मानव को बारूद के ढेर पर खड़ा कर दिया है। कब इसका विस्फोट मानव जाति को राख का ढेर बना देगा, कोई नहीं जानता है। मनुष्य ने जिसके माध्यम से अभय को खोजने की कोशिश की थी, आज वही भय का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है। यही कारण था कि आज से लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान महावीर ने यह उद्घोष कर दिया था कि अस्त्र-शस्त्र के सहारे मानव जाति में अभय का विकास सम्भव नहीं है। उन्होंने आचारांग में कहा था "अत्थि सत्थेन परंपरं, नत्थि असत्थेन परंपरं" अर्थात् शस्त्र तो एक से बढ़कर एक हो सकते हैं, किन्तु अशस्त्र से बढ़कर तो कुछ हो ही नहीं सकता है । महावीर की यह वाणी आज शत-प्रतिशत सत्य सिद्ध हो रही है। अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण की दौड़ में हमने एक से बढ़कर एक संहारक शस्त्रों का निर्माण किया और संहारक शस्त्रों के निर्माण की यह दौड़ आज उस स्थिति तक पहुँच चुकी है, जहाँ सम्पूर्ण मानवता के लिए एक चिता तैयार कर ली गई है, कब और कौन उसे मुखाग्नि देकर समाप्त कर देगा, कोई नहीं जानता । अस्त्र-शस्त्रों के निर्माण के द्वारा जिस अभय की खोज का प्रयत्न मानव-जाति ने किया था, वह वृथा ही सिद्ध हुई है। यदि मानव जाति में अभय का विकास करना है तो वह शस्त्रीकरण से नहीं, निःशस्त्रीकरण से
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