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________________ ४१६ ] सिद्धान्तसार दीपक चतुःपञ्चाशद कोनत्रिशच्छतयोजनः । प्रसंज्ञिपञ्चखानां च विषयः स्पर्शनप्रजः ॥१५॥ चापानां हि चतुःषष्टिः शतानि रसनाक्षजः । विषयो धनुषां द्वावशाप्रपञ्चशतानि च ॥१५६।। विषयो घ्राणरवोत्पन्नो धनुः शतचतुः प्रमः । चक्षुरिन्द्रियसंजात विषयो रूपिदर्शकः ।।१५७॥ योजनानां किलाष्टा कोनषष्टिशतप्रमः । श्रोत्राक्ष विषयश्चापाष्टसहनप्रमाणकः ॥१५८।। संज्ञिपञ्चेन्द्रियाणां च स्पर्शाक्षस्याखिलोत्तमः । रसनाक्षस्य हि ब्राणेन्द्रियस्य विषयो भुधि ॥१५६।। प्रत्येक वर्तते स्वस्वार्थेयोजननवप्रमः । सहस्राः सप्तचत्वारिंशस्त्रिषष्टयधिके शते ॥१६॥ द्वे महायोजनानां चैकक्रोशो धनुषां तथा । दण्डपञ्चदशारारिण द्वादशैव शतानि च ॥१६१॥ हस्तैको यवतुशाग्रेद्वेऽङ्गुलेऽखिलोत्तमाः । इत्यस्ति संजिनां चक्षुविषयो दूरदर्शकः ।।१६२।। श्रोत्रस्य विषयो ज्येष्टो योजनद्वादशप्रमः । पञ्चते विषयोत्कृष्टा ज्ञेया महषिचक्रिणाम् ।।१६३॥ अर्थ:-पागम में पृथिवीकायिक से लेकर बनस्पतिकायिक पयंन्त एकेन्द्रिय जीवों के स्पर्श का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ४०० धनुष कहा है ।। १४८ ।। द्वीन्द्रिय जीवों के स्पर्श का विषय क्षेत्र ८०० धनुष है॥१४॥ और इन्हीं द्वीन्द्रिय जीवों के रसनेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ६४ धनुष प्रमाण है। पीन्द्रिय के स्पर्शनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र १६०० धनुष, रसनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र १२८ धनुष और घ्राणेन्द्रिय का विषय क्षेत्र १०० धनुष प्रमाण है। चतुरिन्द्रिय जीवों के स्पर्शनेन्द्रिय का विषय क्षेत्र ३२०० धनुष, रसनेन्द्रिय का विषयक्षेत्र २५६ धनुष, घ्राणेन्द्रिय का विषयक्षेत्र २०. धनुष और चक्षुरिन्द्रिय का उत्कृष्ट विषयक्षेत्र २६५४ योजन प्रमाण होता है । असंज्ञी पंचेन्द्रिय जीवों का स्पर्शनेन्द्रिय का विषयक्षेत्र ६४०० धनुप, रसनेन्द्रिय का ५१२ धनुष, घ्राणेन्द्रिय का ४०० धनुष, चक्षुरिन्द्रिय का उत्कृष्ट विषयक्षेत्र ५६० योजन और श्रोत्रेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषय क्षेत्र ८०० घनुष प्रमाण होता है। ॥१५०-१५८॥ संज्ञो पंचेन्द्रिय जीवों के स्पर्शनेन्द्रिय का उत्कृष्ट विषयक्षेत्र ६ योजन, रसनेन्द्रिय का .
SR No.090473
Book TitleSiddhantasara Dipak
Original Sutra AuthorBhattarak Sakalkirti
AuthorChetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages662
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size15 MB
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