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________________ गृहस्थाश्रम का नाम जन्म स्थान पिता माता भाई परम पूज्य, अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोगी, प्रवरवक्ता, परम विदुषी रत्न, मार्यिका १०५ श्री विशुद्धमति माताजी । जाति जन्म तिथि लौकिक शिक्षण धार्मिक शिक्षण धार्मिक शिक्षा गुरु कार्यकाल संक्षिप्त जीवन परिचय वैराग्य का कारण — — —— — 464 - श्री सुमित्राबाई रीटो ( जि० जबलपुर ) म०प्र० श्रीमान् सि० लक्ष्मणनालजी सी० मथुराबाई श्री नीरज जी जैन एम. ए. (गोमटेश गाथा के लेखक ) श्रीर श्री निर्मलकुमारजी जैन मु० सतना ( म०प्र० ) गोला पूर्व सं० १९८६ चैत्र शुक्ला तृतीया शुक्रवार दि० १२१४ / १६२६ ई० १. शिक्षकोय ट्रेनिंग ( दो वर्षीय ) २. साहित्य रत्न एवं विद्यालंकार । शास्त्री ( धर्म विषय में ) परम माननीय विद्वद्- शिरोमणि पं० डा० पन्नालालजी साहित्याचार्य सागर ( म०प्र०) श्री दि० जैन महिलाश्रम ( विधवाश्रम ) का सुचारु - रीत्या संचालन करते हुए प्रधानाध्यापिका पद पर करीब १२ वर्ष पर्यन्त कार्य किया एवं अपने सद् प्रयत्नों से संस्था में १००८ श्री पार्श्वनाथ चैत्यालय की स्थापना कराई । परम पूज्य परम श्रद्धेय प्राचार्य १०८ श्री धर्मसागरजी महाराज के सन् १९६२ सागर (म०प्र०) चातुर्मास में पू० १०८ श्री धर्मसागर महाराज जी की परम निरपेक्ष-वृत्ति और परम शान्तता का आकर्षण एवं संघस्थ प० पू० प्रदर वक्ता १०८ श्री सन्मतिसागरजो महाराज के मार्मिक सम्बोधन 1
SR No.090473
Book TitleSiddhantasara Dipak
Original Sutra AuthorBhattarak Sakalkirti
AuthorChetanprakash Patni
PublisherLadmal Jain
Publication Year
Total Pages662
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, & Religion
File Size15 MB
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