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________________ ४२२ ] [ ग्रन्थ सूची पंचम भाग - ४२२१. अनन्तयतकथा-मानसागर । पचलं. ४ । प्रा० ११४५३ इञ्च । भाषा-हिन्दी (पद्य) । विषय-कथा । २०काल.X 1 ले०काल । पूर्ण । वेष्टन सं० १११ । प्राप्ति स्थान--दि. जैन पंचायती मंदिर बयामा। ' विशेष---ऋषि खुशालचन्द ने प्रतिलिगि की थी। ४२२२, अनन्तव्रतकथा ब्र० शतसागर। पत्र सं०४ । प्रा० ११:४५ इञ्च । भाषा--- संस्कृत । विषय-कथा । २० काल X । ले० काल X । पूर्ण वेटन सं०२३६ । प्राप्ति स्थान--दि० जैन मंदिर लश्कर जयपुर । ४२२३. अनिरुद्धहरण (उषाहरण)-रतभूषरा सूरि । पत्र सं० ३२ । प्रा० ११४४३ इन् । भारदिपी। विपर-का। .. ! रो. सं. १६६६ । पूर्ण । वेष्टन x। प्राप्ति स्थान-दि० जन स भवनाथ मंदिर उदयपुर । विशेष—पादि अंत भाग निम्न प्रकार हैंप्रारंभ--दूहा परम प्रतापी परमत् परमेश्वर स्वरूप । परमठाय को लहीजे अकल प्रक्ष अरूप । सारदादेवी सुन्दरी सारदा रोहन नाम । धीजिनवर मुन्न धी उपनी अनोपम उमे उत्तमा ठाम ।। अण " नत्र कोडि जो मुनिवर प्रान महंत । तेह तणा चरण कमल नम जेहता गुण छ अनंत । देव सरस्वती गुरु नगी कहूँ एक कथा विनोद । भचियरग जन सहुँ साभलो निज मन धरी प्रमोद । उषा हरण जंजन कहि जे मिथ्याती लोक । अणिमधि हरिकारि ग्रागयो तहती वचन ए फोक ।। 'शुद्ध पुराण जोह करी कया एक एक सार । भबियण जन सह सांभलो अभिरुचि हरेरण विचार॥ बात कथा सङ्गु परहरो परहरी काज निकाम ।। 'गह का रस सांभलो चित्त घरो एक ठाम ।।५।। मध्यमाग-- ऊपी बोलि मंबरी बारिण, सामल सखी सुसुम्बनी खाण । लखी लिखी तु देखाडि सोक, ताहरी म सायति सघली फोक ॥१७॥ परे जिन वीस तणा जे बंश अनि बीजा रूप लख्या परसस 1 भमि गोचरी केस रूप नगमि तेहनि एक सरूपः ॥५८।। द्वारावती नगरी को ईस जेनि बहुजन नामि सीस । वजय विक्षात, नेमीश्वर केरो ते तात ॥५६॥ एहं प्रावि हरिवंशी जेह कपटि लिख्या पांडवना देह ।। संह माही को तेहानि नबिगमि, लली तुकामुमति नमी ।।६०॥ .
SR No.090396
Book TitleRajasthan ke Jain Shastra Bhandaronki Granth Soochi Part 5
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKasturchand Kasliwal, Anupchand
PublisherPrabandh Karini Committee Jaipur
Publication Year
Total Pages1446
LanguageHindi
ClassificationCatalogue, Literature, Biography, & Catalogue
File Size30 MB
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