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________________ वह प्रमाण दो प्रकार का है-प्रत्यक्ष और परोक्ष ।इसमें जो स्पष्ट अवभास है, वह प्रत्यक्ष है।यह स्पष्टता क्या है?विशेष ज्ञान यह नहीं कह सकते, पूर्णरूप से संसारी ज्ञान में कहीं भी उसका अभाव होने से।असंपूर्ण रूप से स्पष्टता का परोक्ष-प्रमाण में कथन किया जायगा |प्रकाश से युक्त ग्रहण स्पष्टता है, यह भी नहीं कह सकते व्याप्ति नहीं होने से, रूप ज्ञान में ही आलोक होने से स्पर्शादि ज्ञान में नहीं स्पर्शादि के ज्ञान को परोक्ष भी नहीं कह सकते, स्पर्शादि के ज्ञान को निर्विवाद रूप से प्रत्यक्ष होने से आवरण रहित को ग्रहण करना स्पष्टता है, यह भी नहीं मानना चाहिये, निर्मल स्फटिक से आवृत वस्तु में भी स्पष्ट अवभास होने से।यदि अव्यवहित के ग्रहण को स्पष्ट मानोगे तो "यह वृक्ष है शिंशपा होने से" इस अनुमान मात्र को ही प्रत्यक्षत्व का प्रसंग आयेगा ।अतः अन्तः करण के मल के पृथक् हो जाने के कारण विशुद्धि विशेष ही स्पष्टता है, यह सिद्ध हुआ। 134 11 'सामान्यविशेषः स्पाष्ट्यमिति चेदभिमतमिदं विशुद्धिविशेषस्यैव तत्तत्प्रत्यक्षसदृशतया तद्विशेषत्वात् नित्यनिरवयवरूपस्य च तस्य प्रत्याख्यानात्। कुतः पुनरिदमवगतं स्पष्टमेव प्रत्यक्षमिति? द्विबाहुरेकशिरा नर इत्यपि कुतः? तथैव प्रत्यक्षेणावेक्षणात् प्रत्यक्षस्य स्पष्टत्वें स्वानुभवनेन तथैवान्वीक्षणादिति समः समाधिः ।।35।। योगाचार के अनुसार सामान्य विशेष स्पष्टता है, जैनाचार्य कहते हैं, यह तो हम भी मानते हैं, विशुद्धिविशेष को ही उस प्रत्यक्ष के सदृश होने से सामान्य विशेषत्व होने के कारण।नित्य निरवयवरूप सामान्य विशेष का निराकरण किया गया है।पुनः विपक्षी कहते हैं कि यह कैसे जाना गया कि स्पष्ट ही प्रत्यक्ष है? जैनाचार्य कहते हैं कि एक सिर और दो भुजाओं वाला मनुष्य है यह कैसे जाना गया? यदि यह कहते हो कि ऐसा प्रत्यक्ष से देखा जाने से तो फिर प्रत्यक्ष के स्पष्टत्व में भी स्वानुभव से उसी प्रकार देखा जाने से दोनों का समान समाधान है।।35 || ___ सम्यग्ज्ञानस्य व्यवसायात्मकत्वे प्रत्यक्षस्यापि दभेदस्य तदात्मकत्वेन भवितव्यं, न च तस्य तदस्ति तेनाभिलापसंबद्धतया स्वविषयस्याग्रहणात् तथा तदग्रहणस्यैव व्यवसायत्वादिति चेत्, नैवं', व्यवसायस्यैवाभावप्रसंगात् अभिलापेन हि तद्गतेनैव विषयस्य संबन्धस्तत्र तदभावात् ।स्मरणोपनीतेन संकेतकाल प्रतिपन्नेनेति चेन्न। स्मरणस्य निर्विकल्पकत्वे तद्विषयस्य स्वलक्षणत्वेन क्वचिदुपनयनानुपपत्तेः ।व्यवसायरुपत्वे च तेनापि स्वविषयस्याभिलापसबंद्धस्यैव ' यौगमतं सामान्यविशेषेऽर्थात्परसामान्यं । ' जैनः ।प्राह। अवगतमिति शेषः। बौद्धो वदति। 5 अभिलापसंबद्धस्य स्वविषयस्येत्यर्थः । 6 "विकल्पो नाम संश्रितः" इति वचनात्स्वाभिधानविशेषपेक्षा एव निश्चयैर्निश्चीयते इत्यभ्युपगमात् । अभिलापसंबद्धस्वविषयग्रहणस्य व्यवसायत्वे। १ अनन्यदेशकालाकारत्वेन । 20
SR No.090368
Book TitlePramana Nirnay
Original Sutra AuthorVadirajsuri
AuthorSurajmukhi Jain
PublisherAnekant Gyanmandir Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size14 MB
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