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________________ के प्रध्वंस रूप होने से अभाव स्वभाव होने के कारण विरोध है । भाव और अभाव का परस्पर विरोध होने से विरोध है । ज्ञान और उसकी प्रमिति इस प्रकार भाव और अभावरूपत्व नहीं है, जिससे उनमें एक दूसरे का विरोध होने से विरोध की कल्पना की जाय । अतः विरोध के कारण ज्ञान अपने को नहीं जानता यह नहीं कहा जा सकता। ज्ञान को अपने को न जानने पर उसका नियत विषय ही ज्ञानगम्य है, सभी नहीं यह कैसे कह सकते हो, ज्ञाननियत विषय को ही प्रतिभासित करता है यदि यह कहते हो तो वह अपने को नहीं जानता यह कैसे जाना जा सकता है। 120 ।। न तावत्तत एव स्वप्रतिपत्तिवैकल्यात् । हि स्वप्रतिपत्तिविकलादेव ज्ञाना' त्तत्र नियतार्थप्रतिभासनमन्यद्वा शक्यावबोधमा भूत्ततस्तदवबोधस्तद्विषयात्तु ज्ञानान्तराद्भवत्येवेति चेन्न, तस्यापि स्वप्रतिपत्तिवैकल्ये तत्रापि तद्विषयस्य ज्ञानस्य नियतार्थगोचरत्वमेव प्रतिभाति न निरवशेषवस्तुगोचरत्वमिति तत एवावगन्तुमशक्यत्वात् । तस्यापि नियतविषयत्वमन्यतस्तद्विषयादेव ज्ञानादवगम्यत इति चेन्न, अनवस्थाप्रसंगात् ।सत्येवमपरापरज्ञानपरिकल्पनस्यावश्यंभावात् । ततः सुदूरमपि गत्वा क्वचिन्नियतविषयत्वमध्यवसातुकामेन तद्विषयस्य ज्ञानस्य स्वप्रतिपत्तिरूपत्वमभ्युपगन्तव्यम् । अन्यथा ततस्तद्विषयविज्ञाननियतार्थगोचरत्वप्रतिपत्तेर्दुरूपपादकत्वात् । तथा च सिद्धमर्थज्ञानस्यापि तद्वत्स्वप्रतिपत्तिरूपत्वमविशेषात् । । 21 । । उसी ज्ञान से जाना जाता है, यह नहीं कह सकते क्योंकि वह तो स्वज्ञान से रहित है । स्वज्ञान से रहित ज्ञान से ज्ञान में नियतार्थ गोचरता अथवा सर्वार्थगोचरता का ज्ञान नहीं हो सकता। उसी ज्ञान से उस ज्ञान की नियतार्थ गोचरता अथवा सर्वार्थगोचरता का ज्ञान नहीं होता तो न हो उसको विषय करनेवाले दूसरे ज्ञान से हो जाता है, यह कहना भी ठीक नहीं है, उस दूसरे ज्ञान को भी स्वज्ञान से रहित होने के कारण उस ज्ञान में भी नियतार्थ विषय गोचरता ही प्रतीत होती है संपूर्ण विषय गोचरता नहीं । उसी ज्ञान से उसी ज्ञान को न जाना जा सकने के कारण । उसका नियत विषयत्व अन्य तद्विषयक ज्ञान से जाना जाता है ऐसा कहते हो तो अनवस्था का प्रसंग आयेगा । ऐसा होने पर दूसरे दूसरे ज्ञान की कल्पना आवश्यक हो जाती है । अतः ज्ञान को नियतार्थ विषय गोचर मानने की इच्छा रखने वालों को कहीं न कहीं ज्ञान को स्वप्रतिपत्तिरूप मानने पर अर्थ ज्ञान को भी उसी के समान स्वप्रतिपत्तिरूपता सिद्ध हो जाती है । दोनों में समानता होने से । । 21 ।। यत्पुनरिदमनुमानं, "नात्मविषयमर्थज्ञानं वेद्यत्वात्कलशादिवदिति" तत्र न तावद्वेद्यत्वं नाम सामान्यं तस्य नित्यत्वेन सर्वदा 'भावेषु प्रसंगात् सामान्यादिषु 1 2 4 5 ज्ञाने । सर्वार्थप्रतिभासनं । प्रथमज्ञाने । द्वितीयस्य । स्वप्रतिपत्तिरूपत्वे सति । 6 प्रथमज्ञानस्य । पार्थेषु । 7 11
SR No.090368
Book TitlePramana Nirnay
Original Sutra AuthorVadirajsuri
AuthorSurajmukhi Jain
PublisherAnekant Gyanmandir Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size14 MB
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