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________________ वासनामात्रनिबन्धनत्वेन तस्य विप्लव'त्वात्, अन्यथा केशादेरपि तद्वेदनस्य ततस्तत्प्रसङ्गात् ।केशादिकं वेद्मीति तैमिरिकस्य तत्रापि विकल्पप्रादुर्भावात् भवतु इति चेन्न ।केशादेर्बहिरभा वात्। बहिरसत एव ततस्तद्वेदनस्यान्यत्वमिति चेन्न ।तदप्रतिभासे तत इति तद्वेदनस्येत्यप्यनुपपत्तेः ।न 'चासतः प्रतिभास इति चेन्न ।विभ्रमसामर्थ्यात् असतोऽपि तदुपपत्तेः अन्यथा विकल्पे नीलतद्वेदनान्यत्वस्याप्यप्रतिभासोत्पत्तेः, असत्त्वाविशेषत् ।।13 ।। अभिन्न होने पर नील इतना ही वेद्मि (जानता हूं) इतना ही अनुभव होगा, दोनों का नहीं, दोनों का अनुभव होता हैं, अतः अनुभव से प्रसिद्धि होने के कारण नीलादि की उसके ज्ञान से भिन्न की प्रतीति कैसे हो सकती है।सौगत कहते हैं यह विकल्प ही है, अनुभव नहीं है विकल्प से अन्यत्व का निश्चय नहीं हो सकता , वासनामात्र के कारण होने वाला विकल्प व्यभिचारी होने के कारण, अन्यथा केशादि से उसके ज्ञान को भी विकल्प से अन्यत्व की प्राप्ति हो जायगी |केशादि को जानता हूं इस प्रकार तैमिरिक (नेत्ररोग वाले) को वहां भी विकल्प की उत्पत्ति होने से। केशादि से उसके ज्ञान को अन्यत्व का प्रसंग होता है तो हो, यह कहना ठीक नहीं है। केशादि का बाहर अभाव होने से बाहर न होने पर ही उससे उसके ज्ञान की भिन्नता है, यह भी नहीं कह सकते।केशादि का प्रतिभास नहीं होने पर केशादि से उसके ज्ञान को यह भी नहीं कहा जा सकता।असत का प्रतिभास नहीं होता, ऐसा नहीं कह सकते।विभ्रम के कारण असत का भी प्रतिभास होने से, प्रतिभास नहीं मानने पर नील तथा उसके ज्ञान के अन्यत्व का भी प्रतिभास नहीं होगा, दोनों में असत्व समान होने से।।13।। सत्यम् ।विकल्पस्याऽपि न तत्प्रतिभा सित्वं स्वसंविन्मात्रपर्यवसितत्वात्, विकल्पान्तरमेव तु तत्र तत्प्रतिभासित्वमवकल्पयतीति चेन्न। तेनाऽप्यसतस्तस्यानवकल्पनात्। पुनर्विकल्पान्तरात्तस्य तदवकल्पकत्वे चानवस्थापत्त्या नीलतद्वेदनविवेकविकल्प एव न भवेत् । न चैवं, तस्य तस्याप्रतीतेस्ततो न सङ्गतमिदं, विकल्पो ग्राह्यग्राहकोल्लेखेनोत्पत्तिवान्, सोऽपिस्वरूपे ग्राह्यग्राहकरूपरहित एव 1 अपरेण तथा व्यवस्थाप्यत इति ।।14।। सौगत कहते हैं द्वितीय विकल्प ठीक है विकल्प भी उसका प्रतिभास नहीं करता उसके स्वसंवेदन तक ही सीमित रहने से विकल्पान्तर ही विकल्प में प्रतिभासित्व की 1 व्यभिचारात्। २ विकल्पात् चिदन्यत्वनिश्चये। 'अन्यत्वप्रसंगो भवतु। 'असत्त्वात्। 5 असतो ऽप्रतिभासो वा प्रतिभास इति विकल्पयन्नाह । ६ द्वितीयविकल्पो घटते सौगतबिशेषे। ' कर्तृतापन्न। स्वस्मिन्नविद्यमानस्य। १ तदन्यत्वविकल्पाभावो न च। 10 अन्यविकल्पेन विकल्पांतरेणेति यावत।
SR No.090368
Book TitlePramana Nirnay
Original Sutra AuthorVadirajsuri
AuthorSurajmukhi Jain
PublisherAnekant Gyanmandir Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size14 MB
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