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________________ रूप न होने पर उसके नीरूपत्व की प्राप्ति होने से। प्रवृत्तिरूप भी नहीं है, स्वरूपादि के समान अव्युत्पत्ति आदि को भी प्रवृत्तिरूपत्व की प्राप्ति होने से। आचार्य कहते हैं ऐसा नही हैं, एकांत रूप से निवृत्ति रूप से तथा प्रवृत्ति रूप से उसका निश्चय नहीं होने से। अतः उसके उभय स्वभाव होने पर प्रवृत्तिरूप से साधकतम तथा अव्युत्पत्त्यादि की निवृत्ति रूप से कियाभाव के होने से किया कारक भाव की अनुत्पत्ति नहीं हैं। 16 ।। कथमेवमपि प्रमितिक्रियायां तत्सहभाविनः संवेदनस्य साधकतमत्वमितिचेन्न। प्रागपि' भावात्, तत एव संवेदनात्प्रागपि विषयान्तरे प्रमितिक्रियानिष्पत्तेः ।अन्यदेव तत्संवेदनं विषयभेदे तद्भेदस्याऽवश्यंभावादिति चेत् । न।युगपदप्येवं प्रसङ्गात्, तथा च कथं सेनावनादिप्रतिपत्तिः । ।7।। विपक्षी पुनः कहते हैं-ऐसा होने पर भी प्रमितिक्रिया में प्रमिति के साथ होने वाले संवेदन को साधकतम कैसे कहा जा सकता है आचार्य कहते हैं यह कहना ठीक नहीं है, प्रमिति से पूर्व भी संवेदन के होने से उसी संवेदन से पहले भी दूसरे विषय में प्रमिति किया के सम्पन्न होने से विपक्षी कहते हैं वह संवेदन अन्य ही होगा, विषय का भेद होने पर संवेदन में भी भेद अवश्य होने से आचार्य कहते हैं ऐसा नहीं है, एक साथ भी ऐसा प्रसंग होने से।फिर विषय का भेद होने पर संवेदन में भेद होने पर सेना, वन आदि का ज्ञान कैसे होगा? ||7 || न हि करितुरगादेर्धवखदिरादेश्चैकसंवेदनविषयत्वाभावे तत्प्रतिपत्तिः संभवति। युगपद्विषयभेदेऽपि एकमेव संवेदनं, तथा तस्यानुभवादिति चेन्न । कमेणापि तथा तदनुभवस्याविशेषात् । परापरसमयव्याप्तेरनुभवगम्यत्वे कुतो न "तस्याऽऽजन्ममरणावधिरप्यनुभव इति चेन्न।यावच्छक्तिकमेवानुभवस्य तत्र व्यापारात् ।अन्यथा वर्तमानेऽपि वस्तुनि सर्वत्राऽपि तस्य व्यापारोपनिपातात् ।।8।। हाथी घोड़ा आदि तथा धव खदिर आदि के एक संवेदन का विषय नहीं होने पर एक संवेदन से उनका ज्ञान नहीं होगा।विपक्षी कहते हैं युगपत् विषय के भिन्न होने पर भी संवेदन एक ही है ऐसा उसका अनुभव होने से।आचार्य कहते हैं कि ऐसा नहीं है, कम से भी एक संवेदन का अनुभव युगपत् के समान ही होने से विपक्षी कहते हैं-पहले और बाद में रहने वाले संवेदन का विषय भेद होने पर भी एकरूप अनुभव होने पर उससे जन्म से मृत्यु पर्यंत का अनुभव क्यों नहीं होता, आचार्य कहते हैं यह कहना ठीक नहीं है ।शक्ति के अनुसार ही अनुभव का विषय में व्यापार होने से अन्यथा वर्तमान वस्तु में भी सर्वत्र उसके व्यापार का प्रसंग आयेगा।।8।। 'प्रमितेः प्रागपि संवेदनस्य भावात्। २ यत्पूर्व विषयांतरे प्रमितिकियामुपजनयति। यगपदिति विषयभेदात्संवेदनभेदे सति। जैनः। अन्यः । 6 विषयभेदेऽप्येकत्वप्रकारेण।
SR No.090368
Book TitlePramana Nirnay
Original Sutra AuthorVadirajsuri
AuthorSurajmukhi Jain
PublisherAnekant Gyanmandir Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size14 MB
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