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________________ श्रीसरस्वत्यै नमो नमः । श्रीमद्वादिराजसूरिविरचितः श्री सरस्वती देवी को नमस्कार हो श्री वादिराज सूरि विरचित प्रमाणनिर्णयः प्रमाणनिर्णय मंगलाचरणम्! श्रीवर्द्धमानमानम्य, जिनदेवं जगत्प्रभुम् । सक्षेपेण प्रमाणस्य निर्णयो वर्ण्यते मया।।1।। .. संसार के प्रभु श्री वर्द्धमान जिनदेव को नमस्कार करके मेरे द्वारा संक्षेप में प्रमाण के निर्णय का वर्णन किया जाता है।1।। प्रमाणलक्षणनिर्णयः। - (प्रथम लक्षण निर्णय) सम्यग्ज्ञानं प्रमाणं प्रमाणत्वाऽन्यथाऽनुपपत्तेः। इदमेव हि प्रमाणस्य प्रमाणत्वं यत्प्रमितिक्रियां प्रति साधकतमत्वेन करणत्वं तच्च तस्य सम्यग्ज्ञानत्वे सत्येव भवति नाऽचेतनत्वे नाऽप्यसम्यग्ज्ञानत्वे।।1।। सम्यग्ज्ञान प्रमाण है, सम्यग्ज्ञान के बिना प्रमाणत्व की उत्पत्ति नहीं होने से प्रमाण की प्रमाणता यही है कि वह प्रमिति किया के प्रति साधकतम होने के कारण उसका करण है।वह प्रमाणता उस करण के सम्यग्ज्ञान होने पर होती है, अचेतन वस्तु तथा मिथ्याज्ञान में प्रमाणता नहीं होती।।1।। न'नु च तकियायामस्त्येवाचेतनस्यापीन्द्रियलिङ्गादेः करणत्वं, चक्षुषा प्रमीयते धूमादिना प्रमीयत इति तंत्राऽपि प्रमितिकियाकरणत्वस्य प्रसिद्धेरिति चेत्। ननु च प्रमिति माव्युत्पत्त्यादिव्यवच्छित्तिरेव। सत्यामेव तस्यां चेतनस्येतरस्य वा प्रमितत्वोपपत्तेः । न च तत्राऽचेतनस्य करणत्वमविरोधात्। 1 "ननु च" शब्दोऽत्र विरुद्धोक्तौ ।नैयायिकमतमिदम् । ' इद्रियलिंगादावपि। 3 "प्रश्नावधारणानुज्ञाऽनुनयामंत्रणे ननु" इत्यमरः । • अनध्यवसायः।
SR No.090368
Book TitlePramana Nirnay
Original Sutra AuthorVadirajsuri
AuthorSurajmukhi Jain
PublisherAnekant Gyanmandir Shodh Sansthan
Publication Year
Total Pages140
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size14 MB
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