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जैसा दिखावा करते हैं और पीठ पीछे छुरा भोंकते हैं, जहर उगलते हैं। ऐसे लोग महानीच होते हैं। ऐसे लोगों के लिए भयंकर से भयंकर नरक में भी जगह नहीं मिलेगी। एक घटना सुनाऊँ आपको ? जब हम बालाजी के सन्निधान में रहे, तब ऐसे ही लोगों की एक टोली ने आकर बड़े प्रेम के साथ हमसे विनती की। कहा, 'आप हमारे लिए भगवान् के सदृश हैं। उत्तर की ओर आपके प्रवास के बाद पोय्सल राज्य मैं आपके विरुद्ध षड्यन्त्रकारी बढ़ते जा रहे हैं। आपने राजा को मतान्तरित किया, इतना ही नहीं, भ्रष्टशील लड़की से महाराज का विवाह कराकर उसे उनकी रानी बनाया है। उस लड़की से आपका क्या सम्बन्ध है, सो भी सुनने में आया कि वे जानते हैं। यह चर्चा महाराज और पट्टमहादेवी के कान तक पहुँची है अतः वे भी आप पर आगबबूला हो रहे हैं। यदि आपको अपने प्राणों की चिन्ता हो तो आप यहीं रह जाएँ। नहीं तो आप चोल देश लौट जाइए' यों उन लोगों ने सलाह दी। वे यहीं तक न रुके, आगे बोले, 'हम धर्म-द्रोही कहलाने लायक हैं। यवन के महल में अपवित्र बनी और यवनकुमारी के पास खिलौने की तरह पड़ी रहनेवाली पंचलौह की प्रतिमा को लाकर पवित्रता का नाश किया है। इन कारणों से पोय्सल प्रजा ही विरुद्ध हो उठी है। इसलिए आप न यदुगिर जाएँ, न ही पोय्सल राज्य में और जल्दी ही अपने लोगों को चिट्ठी लिख भेजें और उन्हें अपने पास बुला लें।' आदि-आदि कहकर हमें डराया। अभी हम अकेले ये बातें सुना रहे हैं। वे एक साथ टोली बाँधकर आते और प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने ढंग से सुनो और हमें अपने अन्तर ने कुछ और ही सलाह दी। आज हम यहाँ हैं, ये सारी बातें झूठ निकलीं। अभी एक महीने से भी अधिक समय से हमारा यहाँ रहना ही इस बात का साक्षी है। धर्म के नाम पर इस तरह की बातें नहीं होनी चाहिए।" इतना बताकर वें मौन हो गये। लोग मूक होकर सारी बातें सुनते रहे ।
" मेरे परमपूज्य, प्रिय गुरुवर्य अपने अनुभव बताएँगे।" पट्टमहादेवी शान्तलदेवी ने अपने गुरु प्रभाचन्द्र सिद्धान्तदेव से प्रणामपूर्वक विनती की। आमतौर पर गुरुवर्य प्रभाचन्द्रजी ऐसी सभाओं में सम्मिलित नहीं हुआ करते थे। आज पट्टमहादेवीजी की आग्रहपूर्ण विनती के कारण आये थे। वे हाथ जोड़, आँखें बन्द कर, ध्यानमुद्रा में बैठे, फिर थोड़ी देर बाद ' णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, नमो लोए सव्वसाहूणं' कहकर, प्रणाम कर आँखें खोलीं। उन्होंने उपस्थित सभासदों की ओर देखा और कहा, "विशिष्टाद्वैत सिद्धान्तशिरोमणि श्री श्री आचार्यजी महाराज एवं हमारी परम विश्वासपात्र शिष्या पट्टमहादेवीजी, पोय्सल राज्य के अनेक धर्मावलम्बी महनीय प्रजाजन ! हम इस तरह के सभा-समारम्भों में नहीं आते। पट्टमहादेवीजी की साग्रह विनती को हम टाल नहीं सके, इसलिए चले आये हैं। उन्होंने हमसे अपने सन्तोष के लिए किसी कार्य की अपेक्षा नहीं की। परन्तु सत्य का निरूपण करने के
132 :: पट्टमहादेवी शान्तला भाग चार