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________________ मूलाचार प्रदीप ] ( ३१६ } [ षष्ठम अधिकार ध्यान करने वालों को सवा इस ध्यान को धारण करना चाहिये ।।२०७३-२०७४।। शुक्लध्यान के भेद, प्रभेदों का वर्णनशुषलपरमशुपलं ध शुपयामिति द्वधा । सपृश्य वितकाढध' बांधार शुक्लमादिमम् ।।७।। तयकस्ववितर्कावीचारशुक्ल द्वितीयकम् । इतिगुगलविषाध्यानं केवलशाननेत्रदम् ॥२०७६11 प्रतिपातिचिनिष्क्रान्तं शुक्लसूक्ष्माफियालयम् । समुचिन्न क्रियं शुक्स द्विति परमं स्मृतम् ।।७७।। तद्वाह्माध्यामिकाभ्यां च शुक्लध्याममपिद्विधा । अत्यन्तसाम्यसापन्न नेत्रस्पंवावि जितम् ।।७८|| सबद्वन्द्वातिगं बाह्य शुक्लं व्यक्तं सा भुभि । मनः शुद्धिकरं तत्स्यसंवेधात्मिकंमहत् ।।२०७६।। अर्थ- शुक्लध्यान के दो भेद हैं एक शुक्लध्यान और दूसरा परम शुक्लध्यान । उसमें भी पहले शुक्लध्यान के दो भेद हैं एक पृथक्त्ववितर्फवीचार और दूसरा एकत्ववितर्कअबीचार । इसप्रकार पहले शुक्लध्यान के दो भेद हैं और दोनों केवलज्ञानरूपी नेत्रों को प्रगट करनेवाले हैं। पहले शुक्लध्यान के समान दूसरे परम शुक्लध्यान के भी दो भेद हैं, एक सूक्ष्म क्रियाप्रतिपाती और दूसरा समुच्छन्नक्रियानिवृत्ति । इसके सिवाय बाह्य और अभ्यंतर के भेद से भी इस शुक्लध्यान के दो भेद हैं । जिस ध्यानमें अत्यंत उत्कृष्ट साम्यभाव प्रगट हो जाय, नेत्रोंका स्पंदन प्रादि सब छूट जाय, सज्जनों के सब संकल्प विकल्प छट जाय और जो सज्जनोंको प्रगट मालूम हो उसको बाहर शुक्लध्यान कहते हैं । तथा जो अपने प्रात्मा के ही गोचर है और मनको शुद्ध करनेवाला है, उस महान् शुक्लध्यानको अभ्यंतर शुक्लथ्यान कहते हैं ।।२०७५-२०७६॥ पृथक्त्ववितर्कवीचार नामक शुक्ल ध्यान का स्वरूप ---- नानाभेवपृथक्त्वं च वितकाचाधिलश्रुतम् । अर्थव्यंजनयोगानां वीचारः संक्रमो भवेत् ॥२०८०॥ यत्पृथक्त्यषिसज्यिायोचारणमुमीवराः । ध्यायन्ति ध्यानमात्मज्ञाः शुक्संतत्प्रयमंमतम् ।।८।। अर्थ-पृथक्त्ववितकवीचार ध्यानमें अनेक अव्योंका वा अनेक प्रकार के द्रव्यों का ध्यान होता है तथा मन-वचन-काय तीनों योगों से होता है इसलिये इस ध्यानको पृथक्त्व कहते हैं। वितर्क शब्दका अर्थ श्रुतज्ञान है, इस ध्यानको नौ बश वा चौदह पूर्व को जाननेवाला ही प्रारम्भ करता है । अर्थ शब्द और योगों के संक्रमण को वीचार कहते हैं, इस पहले ध्यानमें शब्दों से शब्दांतर, योग से मोगांतर और अर्थ से अतिर का चितवन होता है इसलिये यह ध्यान सवीचार है । प्रास्माको जानने वाले जो मुनिराज पृथक्त्व वितर्क और वीवार के साथ-साथ ध्यान करते हैं उसको पृथक्त्ववितर्कवोचार नामका पहला शुक्लध्याम कहते हैं ॥२०५०-२०५१।।
SR No.090288
Book TitleMulachar Pradip
Original Sutra AuthorN/A
Author
PublisherZZZ Unknown
Publication Year
Total Pages544
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Philosophy, & Religion
File Size14 MB
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