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________________ ४६ मदनजुद्ध काव्य भविष्यतकाल कहम ( 23/2 ) गवावइ ( 64/5 ). उधरउँ ( 53/5 ). गंयागउँ ( 53/5) क्रियाविशेषण कालवाचक-आजु ( 34/5 ), जन्न । 32/2 ), लन्च ( 30/1 ), निन ( 51:31 } दिवसि ( 1212)। स्थानत्राचक-कहूँ (61/2 ), नहिं ( 8/4 ), जार्ह (76/2 ), नाह ( 76/2 ) कहाँ ( 2 2/2 ), तहं ( 10/1 ), कन्य ( 70/2 ) | रीतिवाचक-केम ( 87/4 ), एम ( 34/1 ), अइसी ( 32/5 ), जइसी ( 23/2 ), किम ( 2/2 ), हिप ! :12: तहसी ( 2:: :}, पतु ( 14 ), इसु ( 6/2 )। परिमाणवाचक-इत्ती ( 86/2 ), घणु (68/4 ), अति ( 28/4 ), बेगि ( 311 ) बहुत ( 4312), अतुल ( 45/2 ) बहुती ( 18/1 ) । ध्वन्यात्मकशब्द-ध्वन्यात्मक शब्दों में झडपडहिं ( 7614), गहगहिउ (96/1 ) झल्लर (97/3 ), कलकलाइ ( 109/3 ), खडहडि३ ( 11412 ), रडवडिउ (119/3), झिल्लणु ( 12714 ), गहगहइ ( 140/5 ) आदि के प्रयोग किए हैं। कवि की अन्य विशेषता यह है कि उसने अनेक स्थलों पर क्रिया पद से वाक्य का प्रारम्भ किया है । यथा चल्लियउ रिसह जिणिंद स्वामी ( 97/1 ) प्याइयउ सुतौबउ ताइ सुद्ध ( 80/1 ) हक्कारि भडु चरित ( 9611 ) उष्ट्रियउ मोहराओ दिट्टो नरु सूखीरो-(70/1 ) चिट्ठिउ गहिरु गज्जंतु ( 45/1 ) ढंढोलियउ तित्रउ भुवण ( 65/1 ) परणाई संजमसिरि ( 55/2 ) फिरिउ मनमथु जित्ति सुहु देस ( 57/1 ) फेरिय जगत आणि मंडिवि रणो ( 45/6) चलिउ विवेकु आनन्दकरि (55/1 ) सुणहु स्वामी हई सुकलिकालु (7111) भागहं पिट्टि न धाइयइ पुरुषह, इहु इ पमाणु ( 561 2 ) कवि ने बाल धातु का प्रयोग अपरिमित मात्रा में किया है
SR No.090267
Book TitleMadanjuddh Kavya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuchraj Mahakavi, Vidyavati Jain
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages176
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size3 MB
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