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________________ मदनजुद्ध काव्य - व्याख्या-नरक भूमिमें दयाका नाम-निशानभी नहीं है । मनुष्यलोकसे अनन्तगुणें दुःख वहाँ पर है, जो मोहराजाकी आज्ञा मानते हैं अर्थात् तीव्र मिथ्यादृष्टि हैं, ले भी उसी नाक-म्तर मग हो जाने हैं। क्योंकि मिथ्यात्व ही सबसे बड़ा पाप है । आचार्योने कहा भी है "अश्चेयश्च मिथ्यात्वसमं नान्यतभूभृताम् ।" मिथ्यात्वके कारण ही संसार है एवं सम्यक्त्व का नाम ही मोक्ष है । सहि स्वामि उतारउ मयणु कीय मई आइ सार यह तुम्ह दीय घम्पप्युरु गहु अति विषम थान तिसु उपरि चल्लिउ करिवि तानु ।। ८३।। अर्थ- हे स्वामिन्, मोहराजन्! मदन ने वहाँ अपना उतारा किया है । मैंने आकर, यह उत्तम संदेश आपको दिया है । धर्मपुर नामका जो गढ़ है वह बहुत ही विषम स्थान है । उस गढ़के ऊपर वह कमान तानकर चलता है । व्याख्या-नारीके जघनरंध्रको भी नरककुण्ड या घोरकुण्ड कहते हैं । वहाँ मदनने प्रवेश किया है । उस स्थानमें उपर्युक्त सभी बातें विद्यमान है । नारी और यश, ये दोनों ही विषम घाटियाँ हैं, इनमें पार हो पाना कठिन है । कलिकाल नामके सेवकने मोह राजाको यह संदेश दिया और बताया कि अब मदन तीर कमान तान कर धर्मपुरके गढ़ की तरफ चलनेको उद्यत हैं । आपको पुत्रका साथ देना चाहिए । । अब आइ जुड़ी यह विषम संधि वह संक न मानइ जीति कंधि वह अप्पु अप्पु अप्पउ भणेई वह अवरकोडि तिण वडि गणे ।।०४।। अर्थ-अब यह विषम सन्धि आकर जुड़ गई है । यह आदीश्वर स्वामी बंथि अर्थात् बंधी हुई बाधाओंको जीतकर अब किसीकी शंका (भय) नहीं मानते हैं । उन्होने सब दंद-फंदको जीत लिया है । वे आत्या, आत्मा कहकर अपनी आत्माका उच्चारण करते रहत है, और घर को तृणवत् गिनते (समझते) हैं । व्याख्या-आत्मबल सबसे बड़ा बल है । वह आत्मविश्वाससे प्राप्त होता है । इसलिए आदीश्वरस्वामी केवल आत्मा-आत्माका ही ध्यान करते रहते हैं । उन्होंने सभी विकारी भावोंको जीत लिया है, और अब पूरी तरह निश्चिन्त हो गए हैं । वे किसीकी शंका (भय) नहीं करते, इस
SR No.090267
Book TitleMadanjuddh Kavya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuchraj Mahakavi, Vidyavati Jain
PublisherBharat Varshiya Anekant Vidwat Parishad
Publication Year
Total Pages176
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size3 MB
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