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कषायजय-भावना
कषायों का वर्णन
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स्वभाव शिलाभेद
काल
फल नरकमाते अनन्तकाल नरकगति अनन्तकाल
शैल
बाँस की जड़ नरकगति अनन्तकाल नरकगति
अनन्तकाल
क्रम
कषाय
१- अनन्तानुबन्धी क्रोध २- अनन्तानुबन्धी मान
कृमिराग
३- अनन्तानुबन्धी माया १४- अनन्तानुबन्धी लोभ ५- अप्रत्याख्यानावरणक्रोध पृथ्वीभेद ६. अप्रत्याख्यानावरणमान अस्थि अप्रत्याख्यानावरणमाया मेषशृंग अप्रत्याख्यानावरणलोभ चक्रमल
धूलीरेखा
८
* ९. प्रत्याख्यानावरण क्रोध
१०- प्रत्याख्यानावरण मान काष्ठ
११- प्रत्याख्यानावरण माया १२- प्रत्याख्यानावरण लोभ
गोमूत्र कीचड़
१३. संज्वलन क्रोध
अलरेखा
१४ संज्वलन मान
| बेंत
१५ संज्वलन माया
१६. संज्वलन लोभ
तिर्यंचगति छह माह तिर्यंचगति छह माह
तिर्यंचगति छह माह
तिर्यंचगति छह माह
मनुष्यगति | पन्द्रह दिन मनुष्यगति पन्द्रह दिन
मनुष्यगति पन्द्रह दिन
मनुष्यगति पन्द्रह दिन देवगति
| देवगति
खुरपा
देवगति
हल्दी का रंग देवगति
अन्तर्मुहूर्त
अन्तर्मुहूर्त
अन्तर्मुहूर्त
अन्तर्मुहूर्त
कषाय स्थितिबन्ध एवं अनुभागबन्ध का कारण है। अतः कषायों का अभाव किये बिना संसार का अभाव होना संभव नहीं है। साधक जीव कषायों के दुष्फलों का बार-बार चिन्तन करके ही कषायों से बच सकता है। साधक शिष्यों को कषायों के दुष्फल से परिचित कराने के लिए ही इस ग्रंथ का प्रणयन हुआ है। उपदेशात्मक दृष्टान्तशैली के कारण यह ग्रंथ सर्वजनोपयोगी है।
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मूल ग्रंथकर्ता - इस ग्रंथ के रचयिता मुनि श्री कनककीर्ति जी महाराज है। ग्रंथान्त में उन्होंने अपना यही नाम दिया है। यथा
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