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________________ विपाकी कहते हैं। वे चार हैं. १. नरकायु २. तिर्यगायु ३. मनुष्यायु और ४. देवायु। १३०. प्रश्न : क्षेत्र विपाकी किसे कहते हैं ? और वे कितनी उत्तर : जिनका उदब विग्रहगति रूप क्षेत्र में हो उन्हें क्षेत्र विपाकी कहते हैं। वे चार हैं- १. नरक- गत्यानुपूर्व्य, २. तिर्यग्गत्यानुपूर्य, ३. मनुष्यगत्यानुपूर्व्य और ४. देवगत्यानुपूर्व्य। १३१. प्रश्न : पुण्य प्रकृति किसे कहते हैं ? और वे कौन कौन उत्तर : जिनके उदय से संसारी जीव सुख का अनुभव करता है उन्हें पुण्य प्रकृति कहते हैं। वे भेद विवक्षा से ६८ और अभेद विवक्षा से ४२ हैं। यथा- १ साता वेदनीय २ तिर्यगायु ३ मनुष्यायु ४ देवायु ५ उच्च गोत्र ६ मनुष्यगति ७ मनुष्यगत्यानुपूर्वी ८ देवति ६ देवगत्यानुपूर्वी १० पंचेन्द्रिय जाति १५ औदारिकादि पाँच शरीर २० औदारिकादि पांच बंधन २५ औदारिकादि पाँच संघात २८ औदारिकादि तीन अंगोपांग ४८ शुम वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्श के बीस १६ समचतुरनसंस्थान ५० बज्रर्षभ नाराच संहनन '
SR No.090246
Book TitleKarananuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages125
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size1 MB
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