SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 42
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २. केवलदर्शनावरण, पाँच निद्राएँ, मिथ्यात्व सम्थङ् मिथ्यात्व तथा अनन्तानुबन्धी आदि बारह कषाय । इनमें सम्यमिथ्यात्व का वन्ध नहीं होता; मात्र उदय और सत्त्व होता है। इसका कार्य अन्य सर्व घातियों की अपेक्षा विभिन्न प्रकार का होता है। १२५. प्रश्न : विपाक की अपेक्षा कर्म प्रकृतियों के कितने भेद उत्तर : चार हैं. १. जीव विपाकी, २. पुद्गल विपाकी, ३. क्षेत्र विपाकी और ४. भव विपाकी। १२६. प्रश्न : जीव विपाकी किसे कहते हैं ? और वे कौन कौन उत्तर : प्रमुख रूप से जिनका फल आत्मा पर होता है उन्हें जीव विपाकी कहते हैं। वे निम्नलिखित ७८ हैं जैसे घातिया कर्मों की ४७, वेदनीय की २, गोत्र की २ और नामकर्म की २७1 १२७. प्रश्न : नामकर्म की २७ जीव विपाकी प्रकृतियाँ कौन कौन हैं? उत्तर : १. तीर्थकर २. उच्छ्वास ३. बादर ४. सूक्ष्म ५. पर्याप्त (३७)
SR No.090246
Book TitleKarananuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages125
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size1 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy