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________________ . ८०. प्रश्न : वज्रनाराच संहनन नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर : जिसके उदय से वज्र के हाड़ तथा वन की कीलें हों परन्तु वेष्टन वज्र के न हों उसे बज नाराच संहनन नामकर्म कहते हैं । ८१. प्रश्न : नाराच संहनन नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर: जिसके उदय से शरीर के हाड़ साधारण वेष्टन और कीलों से सहित होते हैं उसे नाराचसंहनन नामकर्म कहते हैं । ८२. प्रश्न: अर्धनाराच संहनन नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर : जिसके उदय से हाड़ों की सन्धियाँ अर्धकीलित हों उसे अर्धनाराच संहनन नामकर्म कहते हैं। ८३. प्रश्न: कीलक संहनन नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर: जिसके उदय से हाड़ों की सन्धियाँ साधारण कीलों से युक्त हों उसे कीलक संहनन नामकर्म कहते हैं | ८४. प्रश्न : असंप्राप्त सृपाटिका संहनन नामकर्म किसे कहते हैं ? उत्तर: जिसके उदय से हाड़ परस्पर नसों से बंधे हों, कीलित न हों, उसे असंप्राप्त सृपाटिका संहनन नामकर्म कहते हैं। (२५)
SR No.090246
Book TitleKarananuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPannalal Jain
PublisherBharat Varshiya Digambar Jain Mahasabha
Publication Year
Total Pages125
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Ethics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size1 MB
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