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उक्त १५८ प्रकृतियों के नाम और लक्षण इसी ग्रन्थ (कर्मविपाक, प्रथम कर्मग्रन्थ) में कहे गये हैं, अतः जिज्ञासु जनों द्वारा वहाँ दृष्टव्य हैं । प्रवेशबन्ध का वर्णन
जीव अपनी कायिफ आदि क्रियाओं द्वारा जितने कमंप्रदेशों, अर्थात् कर्मपरमाणुओं का संग्रह करता है, उसको प्रदेशबंध कहते हैं। वे प्रदेशा विविध प्रकार के कर्मों में विभक्त होकर आत्मा के साथ संबद्ध रहते हैं । उनमें से आयकर्म को सबसे कम हिस्सा और आयुकर्म की अपेक्षा नामकर्म को कुछ अधिक हिस्सा मिलता है । गोत्रकर्म का हिस्सा नामकर्म के बराबर है ! इससे कुछ अधिक भाग ज्ञानाबरणीय, दर्शनावरणीय और अन्तराय कमों को प्राप्त होता है । इन तीनों का भाग समान रहता है । इससे भी अधिक भाग मोहनीयकर्म को प्राप्त होता है और सबसे अधिक भाग बेदनीय कर्म को मिलता है। इन प्रदेशों का पुनः उत्तरप्रकृतियों में विभाजन होता है। प्रत्येक प्रकार के बद्ध कर्म के प्रदेशों की न्यूनाधिकता का यही आधार है। स्थितिबन्ध का वर्णन
ज्ञानावरणीय आदि आठ कर्मों की अधिकतम और न्यूनतम समय की विभिन्न स्थितियाँ (उदय में रहने का काल) निम्न प्रकार से कर्म साहित्य में बतलाई गई हैं...
कर्म-नाम
अधिकतम समय
न्यूनतम समय
३० कोटाकोटि सागरोपम
अन्तमुहूर्त
(१) ज्ञानावरणीय (२) दर्शनावरणीय (३) वेदनीय (४) मोहनीय (५) आयु (६) नाम (७) गोत्र () अन्तराय
१२ मुहूर्त अन्तमुहूर्त
७० कोटाकोटि सागरोपम ३३ सागरोपम २० कोटाकोटि सागरोपम
+ मुहूर्त ८ मुहूर्त अन्तमहतं