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________________ १४६ जयधवलासहिये कसायपाहुडे [ वेदगो ७ ० $ ३९८. सव्वणिरय - सव्वपंचिदियतिरिक्ख- मणुस अपज० – देवा भवणादि जाव णवगेवजा त्ति सव्वपय० सव्वपदा० केन्तिया ? असंखेजा । मणुसेसु पंचिंदियतिरिक्खभंगो । णवरि मिच्छ० - णवं स० अवस० सम्म० - सम्मामि ० - इत्थि वेद - पुरिसवेद सव्वपदा० केत्तिया ९ संखेआ । मणुसपअ० मणुसिणी - सव्वदेवा० सव्वपय ० सव्वपदा० केत्तिया ? संखेजा । अणुद्दिसादि अवराजिदा ति सव्वपय० सव्वपदा० असंखेजा । णवरि सम्म० अवत्त ० संखेजा । एवं जाव० । सम्म - सम्मामि ० ९ ३९९. खेत्ताणुगमेण दुविदो णिसो- ओषेण आदेसेण य । ओषेण मिच्छ०ण स० - तिण्णिपदा० केवड खेसे सव्वलोगे । अवत्त० लोग० असंखे० भागे । सोलसक० - छण्णोक० सव्वपदा केवडि खेत्ते १ सव्यलोगे । इत्थवेद - पुरिसवेद० सव्वपदा० केबडि खेत्ते १ लोग ० असंखेभागे । सगदी सव्वपयडीणं सव्वपदा० केव० लोग० असंखे ० भागे । एवं जाव० । $४००. पोसणाणुगमेण दुविहो णिद्दसो- ओघेण आदेसेण य । ओषेण मिच्छत्त० तिणिपद० के० पोसिदं १ सव्वलोगो । अवत्त० लोग० असंखे ० भागो अट्ठ बारह एवं तिरिक्खा० । $ ३९८. सब नारकी, सब पचेन्द्रिय तिर्यन, मनुष्य अपर्याप्त, सामान्य देव और भवनवासियोंसे लेकर नौ वैयक तकके देवोंमें सब प्रकृतियोंके सब पदोंके उदीरक जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं । सामान्य मनुष्यों में पचेन्द्रिय तिर्योंके समान भंग है । इतनी विशेषता इनमें मिथ्यात्व और नपुंसकवेदके अवक्तव्य पदके उदीरक जीव तथा सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, स्त्रीवेद और पुरुषवेदके सब पदोंके उदीरक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं । मनुष्य पर्याप्त, मनुष्यनी और सर्वार्थसिद्धिके देवोंमें सब प्रकृतियोंके सब पदोंके उदीरक जीव कितने हैं ? संख्यात हैं। अनुदिशसे लेकर अपराजित विमान तकके देवोंमें सब प्रकृतियोंके सब पदोंके उदीरक जीव असंख्यात हैं । इतनी विशेषता है कि इनमें सम्यक्त्वके अवक्तव्य पदके उदीरक जीव संख्यात हैं । इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए । $ ३९९. क्षेत्रानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश | ओघ मिथ्यात्व और नपु ंसकवेदके तीन पदोंके उदीरकोंका कितना क्षेत्र हैं ? सर्व लोकप्रमाण क्षेत्र है | अवक्तव्य पदके उदीरकोंका लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र है । सोलह कषाय और छह नोकषायोंके सब पदोंके उदीरकोंका कितना क्षेत्र है ? सर्वलोकप्रमाण क्षेत्र है । सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, स्त्रीवेद और पुरुषवेदके सब पदोंके उदीरकोंका कितना क्षेत्र है ? लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र है । इसी प्रकार सामान्य तिर्यों में जानना चाहिए। शेष गतियोंमें सब प्रकृतियोंके सब पदोंके उदीरकोंका कितना क्षेत्र है ? लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण क्षेत्र है। इसी प्रकार अनाहारक मार्गणा तक जानना चाहिए । $ ४००. स्पर्शनानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघ और आदेश । ओघसे मिथ्यात्वके तीन पदके उदीरकोंने कितने क्षेत्रका स्पर्शन किया है ? सर्व लोकप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । अवक्तव्य पदके उदीरकोंने लोकके असंख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागों में से कुछ कम आठ और कुछ कम बारह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्शन किया है । इसी प्रकार नपुंसकवेदके उदीरकोंकी अपेक्षा स्पर्शन जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि
SR No.090223
Book TitleKasaypahudam Part 11
Original Sutra AuthorGundharacharya
AuthorFulchandra Jain Shastri, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatvarshiya Digambar Jain Sangh
Publication Year2000
Total Pages408
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Karma, & Religion
File Size14 MB
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