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________________ संयत अध्ययन उ. प. जइ नो ओसप्पिणि नो उस्सप्पिणिकाले होज्जा किं सुसम सुसमापलिभागे होज्जा, जाव दुस्सम-सुसमापलिभागे होज्जा? उ. गोयमा ! जम्मणं-संतिभावं पडुच्च १. नो सुसम-सुसमापलिभागे होज्जा, २. नो सुसमापलिभागे होज्जा, ३. नो सुसम-दुस्समापलिभागे होज्जा, ४. दुस्सम-सुसमापलिभागे होज्जा। साहरणं पडुच्च-अण्णयरे समाकाले होज्जा। एवं छेदोवट्ठावणिए वि। णवरं-उस्सप्पिणी ओसप्पिणीसु जहा संतिभावं तहा साहरणं पडुच्च वि। जम्मण-संतिभावं पडुच्च-चउसु वि पलिभागेसु नत्थि। सेसं जहा सामाइए। प. परिहारविसुद्धियसंजए णं भन्ते ! किं ओसप्पिणिकाले होज्जा, उस्सप्पिणिकाले होज्जा, नो ओसप्पिणि नो उस्सप्पिणिकाले होज्जा? उ. गोयमा ! ओसप्पिणिकाले वा होज्जा, उस्सप्पिणिकाले वा होज्जा, नो ओसप्पिणि नो उस्सप्पिणिकाले नो होज्जा। प. जइ ओसप्पिणिकाले होज्जा किं सुसम-सुसमाकाले होज्जा जाव दुस्सम-दुस्समाकाले होज्जा? उ. गोयमा ! जम्मणं पडुच्च १. नो सुसम-सुसमाकाले होज्जा, २. नो सुसमाकाले होज्जा, ३. सुसम-दुस्समाकाले वा होज्जा, ४. दुस्सम-सुसमाकाले वा होज्जा, ५. नो दुस्समाकाले होज्जा, ६. नो दुस्सम-दुस्समाकाले होज्जा। संतिभावं पडुच्च१. नो सुसम-सुसमाकाले होज्जा, २. नो सुसमाकाले होज्जा, ३. सुसम-दुस्समाकाले वा होज्जा, ४. दुस्सम-सुसमाकाले वा होज्जा, ५. दुस्समाकाले वा होज्जा, ६. नो दुस्सम-दुस्समाकाले होज्जा। प. जइ उस्सप्पिणिकाले होज्जा किं दुस्सम-दुस्समाकाले होज्जा जाव सुसम-सुसमाकाले होज्जा? उ. गोयमा ! जम्मणं पडुच्च १. नो दुस्सम-दुस्समाकाले होज्जा, २. नो दुस्समाकाले होज्जा, ३. दुस्सम-सुसमाकाले वा होज्जा, ४. सुसम-दुस्समाकाले वा होज्जा, - ८२५ । प्र. यदि नो अवसर्पिणी नो उत्सर्पिणी काल में होता है तो क्या अपरिवर्तित सुसम-सुसमा काल में होता है यावत् अपरिवर्तित दुसम-सुसमा काल में होता है? गौतम ! जन्म और अस्तित्व भाव की अपेक्षा१. अपरिवर्तित सुसम-सुसमा काल में नहीं होता है, २. अपरिवर्तित सुसमा काल में नहीं होता है, ३. अपरिवर्तित सुसम-दुसमा काल में नहीं होता है, ४. अपरिवर्तित दुसम-सुसमा काल में होता है। साहरण की अपेक्षा-किसी भी अपरिवर्तित काल में होता है। इसी प्रकार छेदोपस्थापनीय संयत भी जानना चाहिए। विशेष-उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल में अस्तित्व भाव के समान ही साहरण की अपेक्षा का कथन है। जन्म और अस्तित्व की अपेक्षा-चारों ही पलिभागों में नहीं होता है। शेष कथन सामायिक संयत के समान जानना चाहिए। प्र. भन्ते ! परिहारविशुद्धिक संयत क्या अवसर्पिणी काल में होता है, उत्सर्पिणी काल में होता है या नो अवसर्पिणी नो उत्सर्पिणी काल में होता है? उ. गौतम ! अवसर्पिणी काल में होता है, उत्सर्पिणी काल में होता है, किन्तु नो अवसर्पिणी नो उत्सर्पिणी काल में नहीं होता है। प्र. यदि अवसर्पिणी काल में होता है तो क्या सुसम-सुसमा काल में होता है यावत् दुसम-दुसमा काल में होता है? उ. गौतम ! जन्म की अपेक्षा १. सुसम-सुसमा काल में नहीं होता है, २. सुसमा काल में नहीं होता है, ३. सुसम-दुसमा काल में होता है, ४. दुसम-सुसमा काल में होता है, ५. दुसमा काल में नहीं होता है, ६. दुसम-दुसमा काल में नहीं होता है। अस्तित्व भाव की अपेक्षा१. सुसम-सुसमा काल में नहीं होता है, २. सुसमा काल में नहीं होता है, ३. सुसम-दुसमा काल में होता है, ४. दुसम-सुसमा काल में होता है, ५. दुसमा काल में होता है, ६. दुसम-दुसमा काल में नहीं होता है। प्र. यदि उत्सर्पिणी काल में होता है तो क्या दुसम-दुसमा काल में होता है यावत् सुसम-सुसमा काल में होता है? उ. गौतम ! जन्म की अपेक्षा १. दुसम-दुसमा काल में नहीं होता है, २. दुसमा काल में नहीं होता है, ३. दुसम-सुसमा काल में होता है, ४. सुसम-दुसमा काल में होता है,
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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