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________________ संयत अध्ययन ८११ उ. गोयमा ! वड्ढमाणपरिणामे होज्जा, नो हायमाणपरिणामे होज्जा, अवट्ठियपरिणामे वा होज्जा, एवं सिणाए वि। प. पुलाए णं भंते ! केवइयं कालं वड्ढमाणपरिणामे होज्जा? उ. गौतम ! वर्धमान परिणाम वाला होता है। हायमान परिणाम वाला नहीं होता है। अवस्थित परिणाम वाला होता है। स्नातक का कथन भी इसी प्रकार है। प्र. भन्ते ! पुलाक कितने काल तक वर्धमान परिणाम वाला होता है ? उ. गौतम ! जघन्य-एक समय, उत्कृष्ट-अन्तर्मुहूर्त। उ. गोयमा ! जहण्णेणं-एक्कं समयं, उक्कोसेणं अंतोमुहुत्तं। प. केवइयं कालं हायमाणपरिणामे होज्जा? उ. गोयमा ! जहण्णेणं-एक्कं समयं, उक्कोसेणं-अंतोमुहुत्तं। प. केवइयं कालं अवट्ठियपरिणामे होज्जा? उ. गोयमा !जहण्णेणं-एक्कं समयं, उक्कोसेणं-सत्तसमया। एवं जाव कसायकुसीले। प. णियंठे णं भंते ! केवइयं कालं वड्ढमाणपरिणामे होज्जा? प्र. कितने काल तक हायमान परिणाम वाला होता है? उ. गौतम ! जघन्य-एक समय, उत्कृष्ट-अन्तर्मुहूर्त। प्र. कितने काल तक अवस्थित परिणाम वाला होता है ? उ. गौतम ! जघन्य-एक समय। उत्कृष्ट-सात समय। इसी प्रकार कषायकुशील पर्यन्त जानना चाहिए। प्र. भन्ते ! निर्ग्रन्थ कितने काल तक वर्धमान परिणाम वाला होता है? उ. गौतम ! जघन्य-अन्तर्मुहूर्त, उत्कृष्ट भी अन्तर्मुहूर्त। प्र. कितने काल तक अवस्थित परिणाम वाला होता है? उ. गौतम ! जघन्य-एक समय, उत्कृष्ट-अन्तर्मुहूर्त। प्र. भन्ते ! स्नातक कितने काल तक वर्धमान परिणाम वाला होता है? उ. गौतम ! जघन्य अन्तर्मुहूर्त, उत्कृष्ट भी अन्तर्मुहूर्त। उ. गोयमा ! जहण्णेणं-अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेण वि अंतोमुहुत्तं। प, केवइयं काल अवट्ठियपरिणामे होज्जा? उ. गोयमा ! जहण्णेणं-एक्कं समयं, उक्कोसेणं-अंतोमुहुत्तं। प, सिणाए णं भंते ! केवइयं कालं वड्ढमाणपरिणामे होज्जा? उ. गोयमा ! जहण्णेणं-अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेण वि अंतोमुहुत्तं। प. केवइयं कालं अवट्ठियपरिणामे होज्जा? उ. गोयमा ! जहण्णेणं-अंतोमुहत्तं, उक्कोसणं-देसूणा पुव्वकोडी। २१. बंध-दारंप. पुलाए णं भंते ! कइ कम्मपगडीओ बंधइ? उ. गोयमा ! आउयवज्जाओ सत्तकम्मपगडीओ बंधइ। प. बउसे णं भंते ! कइ कम्मपगडीओ बंधइ? उ. गोयमा ! सत्तविहबंधए वा अट्ठविहबंधए वा, सत्त बंधमाणे-आउयवज्जाओ सत्तकम्मपगडीओ बंधइ, प्र. कितने काल तक अवस्थित परिणाम वाला होता है ? उ. गौतम ! जघन्य-अन्तर्मुहूर्त, उत्कृष्ट देशोन (कुछ कम) क्रोड पूर्व। २१. बंध-द्वारप्र. भन्ते ! पुलाक कितनी कर्म प्रकृतियां बांधता है ? उ. गौतम ! आयु को छोड़कर सात कर्मप्रकृतियां बांधता है। प्र. भन्ते ! बकुश कितनी कर्मप्रकृतियां बांधता है ? उ. गौतम ! सात कर्मप्रकृतियां या आठ कर्मप्रकृतियां बांधता है। सात बांधता हुआ-आयु को छोड़कर सात कर्मप्रकृतियां बांधता है। आठ बांधता हुआ-प्रतिपूर्ण आठों कर्मप्रकृतियां बांधता है। प्रतिसेवनाकुशील का कथन भी इसी प्रकार है। प्र. भन्ते ! कषायकुशील कितनी कर्मप्रकृतियां बांधता है ? उ. गौतम ! सात बाँधता है, आठ बांधता है या छह बांधता है। अट्ठ बंधमाणे-पडिपुण्णाओ अट्ठ कम्मपगडीओ बंधइ, एवं पडिसेवणाकुसीले वि। प. कसाय कुसीलेणं भंते ! कइ कम्मपगडीओ बंधइ? उ. गोयमा ! सत्तविह बंधए वा, अट्ठविह बंधए वा, छव्विह बंधए वा, सत्तबंधमाणे-आउयवज्जाओ सत्त कम्मपगडीओ बंधइ, सात बांधता हुआ-आयु को छोड़कर सात कर्मप्रकृतियां बांधता है। आठ बांधता हुआ-प्रतिपूर्ण आठों कर्मप्रकृतियां बांधता है। अट्ठ बंधमाणे-पडिपुण्णाओ अट्ठ कम्मपगडीओ बंधइ,
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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