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________________ ८०६ तायत्तीसगत्ताए उववज्जेज्जा, लोगपालगत्ताए उववज्जेज्जा, अहमिंदत्ताए उववज्जेज्जा? उ. गोयमा ! अविराहणं पडुच्च इंदत्ताए उववज्जेज्जा जाव लोगपालगत्ताए उववज्जेज्जा, नो अहमिंदत्ताए उववज्जेज्जा, विराहणं पडुच्चअण्णयरेसु उववज्जेज्जा, बउसे पडिसेवणाकुसीले विएवं चेव। प. कसायकुसीले णं भंते ! वेमाणिएसु उववज्जमाणे किं इंदत्ताए उववज्जेज्जा, जाव अहमिंदत्ताए उववज्जेज्जा? उ. गोयमा ! अविराहणं पडुच्च इंदत्ताए वा उववज्जेज्जा जाव अहमिंदत्ताए वा उववज्जेज्जा। विराहणं पडुच्च अण्णयरेसु उववज्जेज्जा, प. णियंठे णं भंते ! वेमाणिएसु उववज्जमाणे किं इंदत्ताए उववज्जेज्जा जाव अहमिंदत्ताए उववज्जेज्जा? द्रव्यानुयोग-(२) त्रायस्त्रिंशक देव रूप में उत्पन्न होता है, लोकपाल देव रूप में उत्पन्न होता है, या अहमिन्द्र रूप में उत्पन्न होता है? उ. गौतम ! अविराधना की अपेक्षा से इन्द्र रूप में उत्पन्न होता है यावत् लोकपाल देवरूप में उत्पन्न होता है। अहमिन्द्र रूप में उत्पन्न नहीं होता है। विराधना की अपेक्षा सेइन पदवियों के सिवाय अन्य देव रूप में उत्पन्न होता है। बकुश और प्रतिसेवनाकुशील का कथन भी इसी प्रकार है। प्र. भन्ते ! कषाय कुशील वैमानिक देवों में उत्पन्न होता हुआ क्या इन्द्र रूप में उत्पन्न होता है यावत् अहमिन्द्र रूप में उत्पन्न होता है? उ. गौतम ! अविराधना की अपेक्षा से इन्द्र रूप में भी उत्पन्न होता है यावत् अहमिन्द्र रूप में भी उत्पन्न होता है। विराधना की अपेक्षा से इन पदवियों के सिवाय अन्य देव रूप में उत्पन्न होता है। प्र. भन्ते ! निर्ग्रन्थ वैमानिक देवों में उत्पन्न होता हुआ क्या इन्द्र रूप में उत्पन्न होता है यावत् अहमिन्द्र रूप में उत्पन्न होता है? उ. गौतम ! अविराधना की अपेक्षा से इन्द्र रूप में उत्पन्न नहीं होता है यावत् लोकपाल रूप में भी उत्पन्न नहीं होता है किन्तु अहमिन्द्र रूप में उत्पन्न होता है। . विराधना की अपेक्षा से इन पदवियों के सिवाय अन्य देव रूप में उत्पन्न होता है। प्र. भन्ते ! वैमानिक देवलोकों में उत्पन्न होते हुए पुलाक कितने काल की स्थिति प्राप्त करता है? उ. गौतम ! जघन्य अनेक पल्योपम अर्थात् दो पल्योपम, उत्कृष्ट अठारह सागरोपम। प्र. भन्ते ! बकुश वैमानिक देवों में उत्पन्न होते हुए कितने काल की स्थिति प्राप्त करता है? उ. गौतम ! जघन्य अनेक पल्योपम, उत्कृष्ट बावीस सागरोपम। प्रतिसेवनाकुशील का कथन भी इसी प्रकार है। प्र. भन्ते ! कषायकुशील वैमानिक देवों में उत्पन्न होते हुए कितने काल की स्थिति प्राप्त करता है? उ. गौतम ! जघन्य अनेक पल्योपम, उत्कृष्ट तेतीस सागरोपम। प्र. भन्ते ! निर्ग्रन्थ वैमानिक देवों में उत्पन्न होते हुए कितने काल की स्थिति प्राप्त करता है? उ. गौतम ! अजघन्य अनुत्कृष्ट (केवल) तेतीस सागरोपम की स्थिति प्राप्त करता है। उ. गोयमा ! अविराहणं पडुच्च नो इंदत्ताए उववज्जेज्जा जाव नो लोगपालगत्ताए उववज्जेज्जा, अहमिंदत्ताए उववज्जेज्जा, विराहणं पडुच्च अण्णयरेसु उववज्जेज्जा। प. पुलायस्स णं भंते ! वेमाणिएसु उववज्जमाणस्स केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता? उ. गोयमा ! जहन्नेणं पलिओवमपुहुत्तं, उक्कोसेणं अट्ठारससागरोवमाई। प. बउसस्स णं भंते ! वेमाणिएसु उववज्जमाणस्स केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता? उ. गोयमा !जहण्णेणं पलिओवमपुहुत्तं, उक्कोसेणं बावीसं सागरोवमाई। एवं पडिसेवणाकुसीलस्स वि। प. कसायकुसीलस्स णं भंते ! वेमाणिएसु उववज्जमाणस्स केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता? उ. गोयमा ! जहण्णेणं पलिओवमपुहुत्तं, उक्कोसेणं तेत्तीसं सागरोवमाई। प. णियंठस्स णं भंते ! वेमाणिएसु उववज्जमाणस्स केवइयं कालं ठिई पण्णता? उ. गोयमा ! अजहन्नमणुक्कोसेणं तेत्तीसं सागरोवमाई।
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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