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________________ ७९५ संयत अध्ययन २. अणाईए वा सपवज्जवसिए,' ३. साईए वा सपज्जवसिए। तत्थ णं जे से असंजए साईए सपज्जवसिए से जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं अणंतं कालंअणंताओ उस्सप्पिणिओसप्पिणीओ कालओ। खेत्तओ अवड्ढपोग्गलपरियटें देसूणं। २. अनादि-सपर्यवसित, ३. सादि-सपर्यवसित। उनमें से जो सादि-सपर्यवसित है, वह जघन्य अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अनन्तकाल तक, (अर्थात) काल की अपेक्षा सेअनन्त उत्सर्पिणी-अवसर्पिणियों तक, क्षेत्र की अपेक्षा से-देशोन अपार्द्ध पुद्गलपरावर्तन तक वह असंयतपर्याय में रहता है संयतासंयत-जघन्य अन्तर्मुहूर्त तक और उत्कृष्ट देशोन पूर्वकोटि तक संयतासंयतरूप में रहता है। प्र. भंते ! नोसंयत-नोअसंयत, नोसंयतासंयत कितने काल तक नोसंयत-नोअसंयत, नोसंयतासंयतरूप में बना रहता है ? उ. गौतम ! वह सादि-अपर्यवसित है। संजयासंजए जहण्णेणं अंतोमुहत्तं, उक्कोसेणं देसूणं पुवकोडिं। प. णोसंजए-णोअसंजए, णोसंजयासंजए णं भंते ! णोसंजए-णोअसंजए, णोसंजयासंजए त्ति कालओ केवचिरं होइ? उ. गोयमा ! साईए अपज्जवसिए।२ -पण्ण.प.१८,सू.१३५८-६१ ३. संजयाईणं अंतरकाल परूवणं१. संजयस्स संजयासंजयस्स दोण्हवि अंतर जहण्णेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेणं अवड्ढ पोग्गलपरियटै देसूणं, २. असंजयस्स आइदुवे नत्थि अंतरं, साइयस्स सपज्जवसियस्स जहण्णेणं एक्कं समयं, उक्कोसेणं देसूणं पुव्वकोडीओ, ३. नोसंजय-नोअसंजय-नोसंजयासंजयस्स नत्थि अंतर। -जीया. पडि.९, सू.२४७ ३. संयत आदि के अंतर काल का प्ररूपण१. संयत और संयतासंयत दोनों का अन्तर-जघन्य अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट देशोन अपार्धपुद्गल परावर्तन है। २. असंयत के आदि के दो भंगों का अन्तर नहीं है। सादि सपर्यवसित का अंतर-जघन्य एक समय और उत्कृष्ट देशोन पूर्व कोटि है। ३. नोसंयत-नोअसंयत, नोसंयतासंयत का अन्तर नहीं है। ४. संजयाईणं अप्पबहुत्तंप. एएसि णं भंते ! जीवाणं संजयाणं, असंजयाणं, संजयासंजयाणं, नोसंजय-नोअसंजय, नोसंजयासंजयाण य कयरे कयरेहितो अप्पा वा जाब विसेसाहिया वा? उ. गोयमा !१.सव्वत्थोवा जीवा-संजया, २. संजयासंजया असंखेज्जगुणा, ३. नोसंजय-नोअसंजय, नोसंजयासंजया अणंतगुणा, ४. असंजया अणंतगुणा।३ -पण्ण. प. ३, सु. २६१ ५. नियंठाणं संजयाण य परूवग दार णामाणि १.पण्णवण २.वेद ३. रागे ४. कप्प ५. चरित्त ६.पडिसेवणा ७.णाणे। ८. तित्थे ९. लिंग १०. सरीरे ११.खेत्ते १२. काले १३. गइ १४.संजम १५.निकासे ॥१॥ १६-१७. जोगुवओग १८. कसाए १९. लेस्सा २०. परिणाम २१.बंध २२. वेएय। २३. कम्मोदीरण २४. उवसंपजहण २५. सन्ना य, २६. आहारे॥२॥ ४. संयत आदि का अल्पबहुत्वप्र. भंते ! इन संयतों, असंयतों, संयतासंयतों और नोसंयत-नोअसंयत, नोसंयतासंयत जीवों में से कौन किनसे अल्प यावत् विशेषाधिक है? उ. गौतम ! १. सबसे अल्प संयत जीव हैं, २. (उनसे) संयतासंयत असंख्यातगुणे हैं, ३. (उनसे) नोसंयत-नोअसंयत, नोसंयतासंयत जीव अनन्तगुणे हैं। ४. (उनसे) भी असंयत जीव अनन्तगुणे हैं। ५. निर्ग्रन्थों और संयतों के प्ररूपक द्वार नाम १.प्रज्ञापन,२. वेद,३. राग,४.कल्प,५. चारित्र, ६.प्रतिसेवना, ७.ज्ञान, ८. तीर्थ, ९. लिंग, १०. शरीर, ११.क्षेत्र, १२. काल, १३. गति, १४. संयम, १५. निकर्ष ॥१॥ १६.योग, १७.उपयोग,१८.कषाय, १९.लेश्या,२०.परिणाम, २१. बन्ध, २२. वेदन। २३. कर्मों की उदीरणा, २४. प्राप्त करना-छोड़ना, २५. संज्ञा, २६. आहार ॥२॥ १. प्रथम भंग का कथन अभव्य असंयत की अपेक्षा से है। द्वितीय भंग का कथन भव्य असंयत की अपेक्षा से है। २. जीवा. पडि. ९, सु. २४७ ३. जीवा. पडि. ९, सु. २४७
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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