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________________ द्रव्यानुयोग-(२) असंख्यात सूक्ष्म अकाय के जितने शरीर होते हैं, उतना एक सूक्ष्म पृथ्वीकाय का शरीर होता है। असंख्यात सूक्ष्म पृथ्वीकाय के जितने शरीर होते हैं, उतना एक बादर वायुकाय का शरीर होता है। असंख्यात बादर वायुकाय के जितने शरीर होते हैं, उतना एक बादर अग्निकाय का शरीर होता है। असंख्यात बादर अग्निकाय के जितने शरीर होते हैं, उतना एक बादर अप्काय का शरीर होता है। असंख्यात बादर अप्काय के जितने शरीर होते हैं, उतना एक बादर पृथ्वीकाय का शरीर होता है। हे गौतम ! इतना बड़ा पृथ्वीकाय का शरीर होता है। १२७२ असंखेज्जाणं सुहुमआउकाइयसरीराणं जावइया सरीरा से एगे सुहुमपुढविसरीरे। असंखेज्जाणं सुहुमपुढविकाइयाणं जावइया सरीरा से एगे बायरवाउसरीरे। असंखेज्जाणं बायरवाउकाइयाणं जावइया सरीरा से एगे बायरतेउसरीरे। असंखेज्जाणं बायरतेउकाइयाणं जावइया सरीरा से एगे बायरआउसरीरे। असंखेज्जाणं बायरआउकाइयाणं जावइया सरीरा से एगे बायरपुढविसरीरे। एमहालए णं गोयमा ! पुढविसरीरे पण्णत्ते। -विया.स.१९,उ.३,सु.३१ १९. पुढविकाइयस्स सरीरोगाहणा परूवणंप. पुढविकाइयस्स णं भंते ! के महालया सरीरोगाहणा पण्णत्ता? उ. गोयमा ! से जहानामए रण्णो चाउरंतचक्कवट्टिस्स वण्णगपेसिया तरुणी बलवं जुग जुवाणी अप्पातंका जाव निउणसिप्पोवगया, तिक्खाए वइरामईए सण्हकरणीए, तिक्खेणं वइरामएणं वट्टावरएणं एग महं पुढविकायं जउगोलासमाणं गहाय पडिसाहरिय पडिसाहरिय पडिसंखिविय-पडिसंखिविय जाव इणामेव त्ति कटु तिसत्तखुत्तो ओपीसेज्जा। तत्थ णं गोयमा ! अत्थेगइया पुढविकाइया आलिद्धा, अत्थेगइया नो आलिद्धा, अत्थेगइया संघट्टिया, अत्थेगइया नो संघट्टिया, १९. पृथ्वीकायिक की शरीरावगाहना का प्ररूपणप्र. भन्ते ! पृथ्वीकाय के शरीर की कितनी बड़ी अवगाहना कही गई है? उ. गौतम ! जैसे चक्रवर्ती राजा की चन्दन घिसने वाली दासी हो। जो तरुणी, बलवती, युगवती, युवावय प्राप्त रोगरहित यावत् कला कुशल हो। वह चूर्ण पीसने की वज्रमयी कठोर शिला पर, वज्रमय तीक्ष्ण लोढ़े से लाख के गोले के समान, पृथ्वीकाय का एक बड़ा पिण्ड लेकर बार-बार इकट्ठा करती और समेटती हुई-“मैं अभी इसे पीस डालती हूं," यों विचार कर उसे इक्कीस बार पीस दे तो भी हे गौतम ! कई पृथ्वीकायिक जीवों का उस शिला और लोढ़े से स्पर्श होता है और कई जीवों का स्पर्श नहीं होता है। उनमें से कई पृथ्वीकायिक जीवों का घर्षण होता है और कई पृथ्वीकायिकों का घर्षण नहीं होता है। उनमें से कुछ को पीड़ा होती है और कुछ को पीड़ा नहीं होती है। उनमें से कई मरते हैं और कई नहीं मरते हैं। कई पीसे जाते हैं और कई नहीं पीसे जाते हैं। गौतम ! पृथ्वीकायिक जीव के शरीर की इतनी बड़ी अवगाहना कही गई है। २०. एकेन्द्रियों का अवगाहना की अपेक्षा अल्पबहुत्वप्र. भंते ! इन सूक्ष्म-बादर, पर्याप्तक, अपर्याप्तक, पृथ्वीकायिक, अप्कायिक, तेजस्कायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक जीवों की जघन्य और उत्कृष्ट अवगाहनाओं में कौन किनसे अल्प यावत् विशेषाधिक है? अत्थेगइया परियाविया, अत्थेगइया नो परियाविया, अत्थेगइया उद्दविया,अत्थेगइया नो उद्दविया, अत्थेगइया पिट्ठा, अत्थेगइया नो पिट्ठा, पुढविकाइयस्स णं गोयमा ! एमहालया सरीरोगाहणा पण्णत्ता। -विया.स.१९, उ.३,सु.३२ २०. एगिंदियाणं ओगाहणं पुडुच्च अप्पबहुत्तं.प. एएसि णं भंते ! पुढविकाइयाणं आउकाइयाणं तेउकाइयाणं वाउकाइयाणं वणस्सइकाइयाणं सुहुमाणं बादराणं पज्जत्तगाणं अपज्जत्तगाणं जहण्णुकोसियाए ओगाहणाए कयरे कयरेहितो अप्पा वा जाव विसेसाहिया वा? उ. गोयमा ! . १. सव्वत्थोवा सुहुमनिओयस्स अपज्जत्तगस्स जहण्णिया ओगाहणा। २. सुहुमवाउकाइयस्स अपज्जत्तगस्स जहणिया ओगाहणा असंखेज्जगुणा। ३. सुहुमतेउकाइयस्स अपज्जत्तगस्स जहणिया ओगाहणा असंखेज्जगुणा। । उ. गौतम! १. सबसे अल्प अपर्याप्त सूक्ष्मनिगोद की जघन्य अवगाहना है। २. (उससे) अपर्याप्त सूक्ष्म वायुकायिक जीवों की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है। ३. (उससे) अपर्याप्त सूक्ष्म अग्निकायिक की जघन्य अवगाहना असंख्यातगुणी है।
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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