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________________ सूत्र विषय पृष्ठांक | सूत्र विषय पृष्ठांक ७०. इन्द्रियवशात जीवों के कर्मबंधादि का प्ररूपण, ११२८-११२९ ७१. क्रोधादिकषायवशात जीवों के कर्मबंधादि का प्ररूपण, ११२९ ७२. प्रकृति बंध आदि चार प्रकार के बंध भेद, ११२९ ७३. कर्मों के उपक्रमादि बंध भेदों का प्ररूपण, ११२९-११३० ७४. अपध्वंस के भेद और उनसे कर्म बंध का प्ररूपण, ११३० ७५. जीव-चौबीसदंडकों में ज्ञानावरणीय आदि । कर्म बाँधते हुए को कितनी कर्मप्रकृतियों का बंध, ११३१-११३३ ७६. जीव-चौबीसदंडकों में हास्य और उत्सुकता वालों के कर्मप्रकृतियों का बंध, ११३४ ७७. जीव-चौबीसदंडकों में निद्रा और प्रचलावालों के.कर्मप्रकृतियों का बंध, ११३४ ७८. सूक्ष्म संपराय जीव स्थान में बँधने वाली कर्मप्रकृतियाँ, ११३५ ७९. विविध बंधकों की अपेक्षा अष्ट कर्म प्रकृतियों के बंध का प्ररूपण, ११३५-११३८ ८०. पाप स्थान विरत जीव-चौबीसदंडकों में कर्मप्रकृति बंध, ११३९-११४१ ८१. ज्ञानावरणीय आदि कर्मों का वेदन करते हुए जीव-चौबीसदंडकों में कर्म बंध का प्ररूपण, ११४१-११४३ ८२. मोहनीय कर्म के वेदक जीव के कर्म बंध का प्ररूपण, ११४३ ८३. जीव-चौबीसदंडकों में अष्ट कर्मप्रकृतियों के बंध स्थानों का प्ररूपण, ११४३-११४४ ८४. उत्पत्ति की अपेक्षा एकेन्द्रियों में कर्म बंध का प्ररूपण, ११४४-११४५ ८५. उत्पत्ति की अपेक्षा अनन्तरोपपन्नक एकेन्द्रियों में कर्म बंध का प्ररूपण, ११४५-११४६ ८६. उत्पत्ति की अपेक्षा परम्परोपपन्नक एकेन्द्रियों में कर्म बंध का प्ररूपण, ११४६ ८७. जीव-चौबीसदंडकों में कितनी कर्म प्रकृति के वेदन का प्ररूपण, . ११४६-११४७ ८८. ज्ञानावरणीय आदि का बंध करते हुए जीव चौबीसदंडकों में कर्म वेदन का प्ररूपण, ११४७ ८९. ज्ञानावरणीय आदि का वेदन करते हुए जीव चौबीसदंडकों में कर्म वेदन का प्ररूपण, ११४७-११४८ ९०. अर्हत के कर्म वेदन का प्ररूपण, ११४८ ९१. एकेन्द्रिय जीवों में कर्मप्रकृतियों के स्वामित्व, बंध और वेदन का प्ररूपण, ११४८-११४९ ६२. अनन्तरोपपन्नक एकेन्द्रिय जीवों में कर्मप्रकृतियों के स्वामित्व, बंध और वेदन का प्ररूपण, ११४९-११५० ९३. परम्परोपपन्नकादि एकेन्द्रिय जीवों में कर्मप्रकृतियों के स्वामित्व, बंध और वेदन का प्ररूपण, ११५० ९४. लेश्या की अपेक्षा एकेन्द्रियों में स्वामित्व, बंध और वेदन का प्ररूपण, ११५०-११५२ ९५. स्थान की अपेक्षा एकेन्द्रियों में कर्मप्रकृतियों का स्वामित्व, बंध और वेदन का प्ररूपण, ११५२ ९६. स्थान की अपेक्षा अनन्तरोपपन्नक एकेन्द्रियों में कर्मप्रकृतियों का स्वामित्व, बंध और वेदन का प्ररूपण, ११५२ ९७. स्थान की अपेक्षा परम्परोपपन्नक एकेन्द्रियों में कर्मप्रकृतियों का स्वामित्व, बंध और वेदन का प्ररूपण, ११५२-११५३ ९८. शेष आठ उद्देशकों में कर्मप्रकृतियों का स्वामित्व, बंध और वेदन का प्ररूपण, ११५३ ९९. स्थान और उत्पत्ति की अपेक्षा सलेश्य एकेन्द्रियों में कर्मप्रकृतियों के स्वामित्व, बंध और वेदन का प्ररूपण, ११५३ १००. कांक्षामोहनीय कर्म के बंध हेतुओं का प्ररूपण, ११५४ १०१. जीव-चौबीसदंडकों में कांक्षामोहनीय कर्म का कृत आदि त्रिकालत्व का निरूपण, ११५४-११५५ १०२. कांक्षामोहनीय कर्म का उदीरण और उपशमन, ११५५-११५६ १०३. कांक्षामोहनीय कर्म का वेदन और निर्जरण, ११५६ १०४. चौबीसदंडकों में कांक्षामोहनीय कर्म का वेदन और निर्जरण, ११५६-११५७ १०५. कांक्षामोहनीय कर्म वेदन के कारण, ११५७ १०६. निर्ग्रन्थों की अपेक्षा कांक्षामोहनीय कर्म के वेदन का विचार, ११५७-११५८ १०७. चार प्रकार की आयु के बंध हेतुओं का प्ररूपण, .११५८ १०८. किसकी कौन-सी आयु का स्वामित्व, ११५८-११५९ १०९. पूर्णायु के पालन और संवर्तन का स्वामित्व, ११५९ ११०. जीव-चौबीसदंडकों में आयु कर्म का कार्य, ११५९ १११. योनि सापेक्ष आयु बंध का प्ररूपण, ११५९-११६० ११२. अल्पायु-दीर्घायु शुभाशुभदीर्घायु के कर्म बंध हेतुओं का प्ररूपण, ११६०-११६१ ११३. जीव-चौबीसदंडकों में आयु.बंध का काल प्ररूपण, ११६१ (२६)
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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