SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 35
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ सूत्र विषय मैथुन परिचारणा और संवास का प्ररूपण ११. मैथुन के भेदों का प्ररूपण, १२. देवों में मैथुन प्रवृत्ति की प्ररूपणा, १३. परिचारक देवों का अल्पबहुत्व, १४. विविध प्रकार की परिचारणा, १५. संवास के विविध रूप, १६. काम के चतुर्विधत्व का प्ररूपण, ३०. कषाय अध्ययन १. कषायों के भेद-प्रभेद और चौबीसदंडको में प्ररूपण, २. दृष्टांतों द्वारा कषायों के स्वरूप का प्ररूपण, (क) राजि (रेखा) के चार प्रकार (क्रोध), (ख) स्तम्भ के चार प्रकार (मान), (ग) केतन ( वक्र पदार्थ) के चार प्रकार (माया), (घ) वस्त्र के चार प्रकार (लोभ), (च) उदक (जल) के चार प्रकार (परिणाम), (छ) आवर्त घुमाव के चार प्रकार, ३. कषायोत्पत्ति का प्ररूपण, ४. कषायकरण के भेद और चौबीसदंडकों में प्ररूपण, ५. कषायनिर्वृति के भेद और चौबीसड़कों में ३१. कर्म अध्ययन प्ररूपण, ६. कषाय प्रतिष्ठान का प्ररूपण, ७. चार गतियों में कषायों का प्ररूपणं, ८. सकषाय-अकषाय जीवों की कायस्थिति, ९. सकषाय- अकषाय जीवों के अन्तर काल का प्ररूपण, १०. सकषाय- अकषाय जीवों का अल्पबहुत्व, १. कर्म अध्ययन की उत्थानिका, २. अध्ययन के अर्थाधिकार, ३. कर्मों के प्रकार, ४. शुभाशुभ कर्म विपाक चौभंगी, ५. कर्मों का अगुरुलघुत्व प्ररूपण, ६. जीवों का विभक्तिभाव परिणमन के हेतु का प्ररूपण, ७. कर्मप्रकृतियों के मूल भेद, पृष्ठांक १०६२ १०६२-१०६५ १०६५ १०६५-१०६६ १०६६-१०६७ १०६७ १०६९ १०७० १०७० १०७० १०७०-१०७१ १०७१ १०७१ १०७१-१०७२ १०७२-१०७३ १०७३ १०७३ १०७३ १०७३-१०७४ १०७४-१०७५ १०७५ १०७५ १०८१ १०८१ १०८१ १०८१ १०८१-१०८२ १०८२ १०८२ सूत्र विषय ८. चौबीसदंडकों में आठ कर्मप्रकृतियों का प्ररूपण, ९. आठ कर्मों का परस्पर सहभाव, १०. मोहनीय कर्म के बावन नाम, ११. मोहनीय कर्म के तीस बंध स्थान, १२. जीव और चौबीसदंडकों में आठ कर्मप्रकृतियों का किस प्रकार बंध होता है, १३. जीव- चौबीसदंडकों में कर्कश अकर्कश कर्मबंध के हेतु, १४. जीव-चौबीसडकों में साता असातावेदनीय कर्मबंध के हेतु, १५. दुर्लभ - सुलभबोधि वाले कर्म बंध के हेतु का प्ररूपण, ( २४ ) २७. अपर्याप्त विकलेन्द्रियों में बँधने वाली नामकर्म की उत्तर प्रकृतियाँ, २८. देव और नैरयिकों की अपेक्षा बँधने वाली नामकर्म की उत्तर प्रकृतियाँ, २९. चार कर्मप्रकृतियों में परीषों का १६. भावी कल्याणकारी कर्म बंध के हेतुओं का प्ररूपण, १७. तीर्थंकर नामकर्म के बंध हेतुओं का प्ररूपण, १८. असत्य आरोप से होने वाले कर्म बंध का प्ररूपण, १९. कर्मनिवृत्ति के भेद और चौबीसदंडकों में प्ररूपण, २०. जीव-चौबीसदंडकों में चैतन्यकृत कर्मों का प्ररूपण, २१. जीव-चौबीसदंडकों में आठ कर्मों के चयादि का प्ररूपण, २२. चौबीसदंडकों में चलित अचलित कर्मों के बंधादि का प्ररूपण, २३. जीव-चौबीसदंडकों में क्रोधादि चार स्थानों द्वारा आठ कर्मों का चयादि प्ररूपण, २४. मूल कर्मों की उत्तर प्रकृतियों, २५. संयुक्त कर्मों की उत्तर प्रकृतियाँ, २६. निवृत्तिबादरादि में मोहनीय कर्माशों की सत्ता का प्ररूपण, समवतार, ३०. आठ-सात छह एक विध बंधक और अबंधक में परीषह, १०८२ १०८२- १०८४ पृष्ठांक १०८४-१०८५ १०८५-१०८७ १०८७-१०८८ १०८८ १०८९ १०८९ १०९० १०९० १०९० १०९० १०९१ ३१. जीवों द्वारा द्विस्थानिकादि निर्वर्तित पुद्गलों का पापकर्म के रूप में चयादि का प्ररूपण, ३२. असंयतादि जीव के पापकर्म बंध का प्ररूपण, १०९१ १०९१-१०९२ १०९२ १०९२-१०९३ १०९३ १०९८ १०९८ १०९८-१९९ १०९९ १0९९-११00 ११00-११09 ११०१-११०२ ११०२-११०४ ११०४
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy