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________________ सूत्र विषय पृष्ठांक | सूत्र विषय पृष्ठांक ९३५ ९३७ ४४. जीव-चौबीसदंडकों में आठ कर्म बाँधने पर क्रियाओं का प्ररूपण, ९२७ ४५. वीची-अवीची पथ (कषाय-अकषाय भाव) में स्थित संवृत अणगार की क्रिया का प्ररूपण, ९२७-९२९ ४६. उपयोग रहित अणगार की क्रिया का प्ररूपण, ९२९ ४७. उपयोग सहित संवृत अणगार की क्रिया का प्ररूपण, .९३० ४८. प्रत्याख्यान क्रिया का विस्तार से प्ररूपण, ९३०-९३५ ४९. श्रमण निर्ग्रन्थों में क्रियाओं का प्ररूपण, ५०. एक समय में एक क्रिया का प्ररूपण, ९३५-९३७ ५१. क्रियमाण क्रिया दुःख का निमित्त, ५२. क्रिया वेदना में पूर्वापरत्व का प्ररूपण, ९३८ ५३. जीव-चौबीसदंडकों में अठारह पाप स्थानों द्वारा क्रियाओं का प्ररूपण, ९३८-९४० ५४. सामान्य जीव और चौबीसदंडकों में पाप क्रियाओं का विरमण प्ररूपण, ९४० ५५. क्रिया स्थान के दो पक्ष, ९४० ५६. तेरह क्रिया स्थानों के नाम, ९४१ ५७. अधर्म पक्ष के क्रिया स्थानों के स्वरूप का प्ररूपण, ९४१-९४७ ५८. अधर्म युक्त मिश्र स्थान के स्वरूप का प्ररूपण, ९४७ ५९. अधर्म पक्ष में प्रावादुकों का समाहरण, ९४७ ६०. अधर्म पक्ष में पुरुषों की प्रवृत्ति और परिणाम, ९४७-९५५ ६१. अधर्मपक्षीय पुरुषों का परीक्षण, ९५५-९५६ ६२. धर्मपक्षीय क्रिया स्थान, ९५६-९५७ ६३. धर्मपक्षीय पुरुष का वैशिष्ट्य, ९५७-९५८ ६४. धर्म बहुल मिश्र स्थान के स्वरूप का प्ररूपण, ९५८-९५९ ६५. धर्मपक्षीय पुरुषों की प्रवृत्ति एवं परिणाम, ९५९-९६३ ६६. सामान्य रूप से अक्रिया, ९६३ ६७. अक्रिया का फल, ९६३ ६८. सुप्त-जागृत-सबलत्व-दुर्बलत्व-दक्षत्व-आलसित्व की अपेक्षा साधु-असाधुपने का प्ररूपण, ९६३-९६४ ६९. चार प्रकार की अन्तक्रियाएँ, ९६५ ७०. जीव-चौबीसदंडकों में अन्तःक्रिया के भावाभाव . का प्ररूपण, ९६६ ७१. चौबीसदंडकों में अनन्तरागतादि की अन्तःक्रिया का प्ररूपण, ९६६ ७२. एक समय में अनन्तरागत चौबीसदंडकों में अन्तःक्रिया का प्ररूपण, ९६७ ७३. चौबीसदंडकों में उदवर्तनानन्तर अन्तःक्रिया का प्ररूपण, ९६७-९७२. ७४. कृष्ण-नील-कापोतलेश्यी पृथ्वी-अप्-वनस्पति कायिकों में अन्तःक्रिया का प्ररूपण, ९७२-९७३ ७५. चौबीसदंडकों में तीर्थंकरत्व और अन्तःक्रिया का प्ररूपण, ९७३-९७५ ७६. चौबीसदंडकों में चक्रवर्तित्व आदि की प्ररूपणा, ९७५-९७६ ७७. चौबीसदंडकों में चक्रवर्ती रत्नों का उपपात, ९७६ ७८. भवसिद्धिकों की अन्तःक्रिया का काल प्ररूपण, ९७६-९७८ ७९. बन्ध और मोक्ष का ज्ञाता अन्त करने वाला होता है, ९७८-९७९ ८०. क्रियावादी आदि समवसरण के चार भेद, ९७९ ८१. अक्रियावादियों के आठ प्रकार, ९७९ ८२. चौबीसदंडकों में वादि समवसरण, ९७९ ८३. जीवों में ग्यारह स्थानों द्वारा क्रियावादी आदि समवसरणों का प्ररूपण, ९७९-९८० ८४. चौबीसदंडकों में ग्यारह स्थानों द्वारा क्रियावादी आदि समवसरणों का प्ररूपण, ९८०-९८१ ८५. क्रियावादी आदि जीव-चौबीसदंडकों में भव सिद्धिकत्व और अभवसिद्धिकत्व की प्ररूपणा, ९८१-९८२ ८६. अनन्तरोपपन्नक चौबीसदंडकों में चार समवसरण का प्ररूपण, ९८३ ८७. क्रियावादी आदि अनन्तरोपपन्नक चौबीसदंडकों में भवसिद्धिक और अभवसिद्धिक का प्ररूपण, ९८३ ८८. परम्परोपपन्नक चौबीसदंडकों में चार समवसरणादि का प्ररूपण, ९८३-९८४ ८९. अनन्तरावगाढ़ादि में समवसरणादि का प्ररूपण, ९८४ २८. आश्रव अध्ययन १. आश्रव के पाँच हेतुओं का प्ररूपण, ९८८ २. आश्रव के पाँच प्रकार, ९८८ १. प्राणातिपात ३. प्राणवध प्ररूपण का निर्देश, ९८८ ४. प्राणवध का स्वरूप, ९८८ ५. प्राणवध के पर्यायवाची नाम, ९८८-९८९ ६. प्राणवध करने वाले, ९८९ ७. जलचर जीवों का वर्ग, ९८९ ८. स्थलचर जीवों का वर्ग, ९८९ (क) उरपरिसर्प जीवों का वर्ग, (ख) भुजपरिसर्प जीवों का वर्ग, ९८९-९९० ९. खेचर जीवों का वर्ग, ९८९ ९९० (२२)
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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