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________________ सूत्र विषय पृष्ठांक विषय पृष्ठांक ८३४-८३५ ८३५ ८३५ २४. उपसंपत्-जहन द्वार, २५. संज्ञा द्वार, २६. आहार द्वार, २७. भव द्वार, २८. आकर्ष द्वार, २९. काल द्वार, ३०. अन्तर द्वार, ३१. समुद्घात द्वार, ३२. क्षेत्र द्वार, ३३. स्पर्शना द्वार, ३४. भाव द्वार, ३५. परिमाण द्वार, ३६. अल्पबहुत्व द्वार, ८. प्रमत्त और अप्रमत्त संयत के प्रमत्त तथा अप्रमत्त संयत भाव का काल प्ररूपण, ९. देवों के संयतत्वादि के पूछने पर भगवान द्वारा गौतम का समाधान, १०. जीव-चौबीसदंडकों में संयतादि का और अल्पबहुत्व का प्ररूपण, ८३५-८३६ ८३६ ८३६-८३७ ८३७-८३८ ८३८ ८३८ ८३९ ८३९ ८३९-८४० ८४० ८४० ८४०-८४१ ८४१ २६. लेश्या अध्ययन १. लेश्या अध्ययन की उत्थानिका, ८४४ २. छह प्रकार की लेश्याएँ, ८४४ ३. द्रव्य-भाव लेश्याओं का स्वरूप, ८४४ ४. लेश्याओं के लक्षण, ८४४-८४५ ५. दुर्गतिसुगतिगामिनी लेश्याएँ, ८४५ ६. लेश्याओं का गुरुत्व-लघुत्व, ८४५-८४६ ७. सरूपी सकर्म लेश्याओं के पुद्गलों का अवभासन (प्रकाशित होना) आदि, ८४६ ८. लेश्याओं के वर्ण, ८४६-८४८ ९. लेश्याओं की गन्ध, ८४८-८४९ १०. लेश्याओं के रस, ८४९-८५१ ११. लेश्याओं के स्पर्श, १२. लेश्याओं के प्रदेश, ८५१ १३. लेश्याओं का प्रदेशावगाढ़त्व, ८५१ १४. लेश्याओं की वर्गणा, ८५१ १५. सलेश्य-अलेश्य जीवों के आरंभादि का प्ररूपण, ८५१-८५२ १६. लेश्याकरण के भेद और चौबीसदंडकों में प्ररूपण, ८५२ १७. लेश्यानिवृत्ति के भेद और चौबीसदंडकों में प्ररूपण, ८५२ १८. चौबीसदंडकों में लेश्याओं का प्ररूपण, ८५२-८५३ १९. चार गतियों के लेश्याओं का प्ररूपण, ८५३ १. नैरयिकों में लेश्याएँ, ८५३-८५४ २. तिर्यञ्चयोनिकों में लेश्याएँ ८५४-८५५ ३. मनुष्यों में लेश्याएँ, ८५६-८५७ ४. देवों में लेश्याएँ, ८५७ २०. संक्लिष्ट-असंक्लिष्ट विभागगत लेश्याओं के स्वामित्व का प्ररूपण, ८५७-८५८ २१. सलेश्य चौबीसदंडकों में समाहारादि सात द्वार, ८५८-८६४ २२. कृष्णादि लेश्या विशिष्ट चौबीसदंडकों में समाहारादि सात द्वार, ८६४-८६५ २३. लेश्याओं का विविध अपेक्षाओं से परिणमन का प्ररूपण, ८६५-८६६ २४. द्रव्य लेश्याओं का परस्पर परिणमन, ८६६-८६७ २५. आकार भावादि मात्रा से लेश्याओं का परस्पर अपरिणमन, ८६७-८६८ २६. लेश्याओं का त्रिविध बंध और चौबीसदंडकों में प्ररूपण, ८६८ २७. सलेश्यी चौबीसदंडकों की उत्पत्ति, ८६८-८६९ २८. सलेश्य नैरयिकों में उत्पत्ति, ८६९ २९. सलेश्य की देवों में उत्पत्ति, ८७० ३०. भावितात्मा अणगार का लेश्यानुसार उपपात का प्ररूपण, ८७० ३१. लेश्यायुक्त चौबीसदण्डकों में जीवों का सामान्यतः उत्पाद-उद्वर्तन, ८७०-८७२ ३२. सलेश्य चौबीसदंडकों में अविभाग द्वारा उत्पाद-उद्वर्तन का प्ररूपण, ८७२-८७३ ३३. सलेश्य जीवों के परभव गमन का प्ररूपण, ८७३-८७४ ३४. लेश्याओं की अपेक्षा गर्भ प्रजनन का प्ररूपण, ८७४ ३५. लेश्याओं की अपेक्षा चौबीसदंडकों में अल्प-महाकर्मत्व की प्ररूपणा, ८७४-८७५ ३६. लेश्या के अनुसार जीवों में ज्ञान के भेद, ८७६ ३७. लेश्या के अनुसार नैरयिकों में अवधिज्ञान क्षेत्र, ८७६-८७७ ३८. अविशुद्ध-विशुद्ध लेश्या वाले अणगार का जानना-देखना, ८७७-८७८ ३९. अणगार द्वारा स्व-पर कर्मलेश्या का जानना-देखना, ८७८ ४०. अविशुद्ध-विशुद्ध लेश्यायुक्त देवों को जानना-देखना, ८७८-८८० ४१. श्रमण निर्ग्रन्थ की तेजोलेश्या की उत्पत्ति के कारण, ८८० ४२. तेजोलेश्या से भस्म करने के कारण, ८८०-८८१ ४३. लेश्याओं की जघन्य-उत्कृष्ट स्थिति, ८८१ ८५१ (२०)
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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