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________________ लेश्या अध्ययन : आमुख आवश्यक सूत्र की हारिभद्रीय टीका में लेश्या को परिभाषित करते हुए कहा गया है-'श्लेषयन्त्यात्मानमष्टविधेन कर्मणा इति लेश्याः' अर्थात् जो आत्मा को अष्टविध कर्मों से श्लिष्ट करती है, वह लेश्या है। एक अन्य परिभाषा 'लिम्पतीति लेश्या' (धवला टीका) के अनुसार जो कर्मों से आत्मा को लिप्त करती है वह लेश्या है। कर्म-बन्धन में प्रमुख हेतु कषाय और योग हैं। योग से कर्मपुद्गल रूपी रजकण आते हैं। कषायरूपी गोंद से वे आत्मा पर चिपकते हैं किन्तु कषाय गोंद को गीला करने वाला जल लेश्या' है। सूखा गोंद रजकण को नहीं चिपका सकता। इस प्रकार कषाय और योग से लेश्या भिन्न है। सर्वार्थसिद्धि, धवला टीका आदि ग्रन्थों में कषाय के उदय से अनुरंजित योग की प्रवृत्ति को लेश्या कहा गया है। यह भावलेश्या का स्वरूप है। लेश्या के दो प्रकार हैं-द्रव्यलेश्या और भावलेश्या। द्रव्यलेश्या पौद्गलिक होती है और भावलेश्या अपौद्गलिक द्रव्यलेश्या में वर्ण, गंध, रस और स्पर्श होते हैं, भावलेश्या अगुरुलघु होती है। द्रव्य एवं भाव-इन दोनों प्रकार की लेश्याओं के छः भेद हैं-१. कृष्णलेश्या, २. नीललेश्या, ३. कापोतलेश्या, ४. तेजोलेश्या, ५. पद्मलेश्या और ६. शुक्ललेश्या। इनमें प्रथम तीन लेश्याएँ दुर्गतिगामिनी, संक्लिष्ट, अमनोज्ञ, अविशुद्ध, अप्रशस्त और शीत-रूक्ष स्पर्श वाली हैं। अन्तिम तीन लेश्याएँ सुगतिगामिनी, असंक्लिष्ट, मनोज्ञ, विशुद्ध, प्रशस्त और स्निग्ध-उष्ण स्पर्श वाली हैं। वर्ण की उपेक्षा कृष्णलेश्या में काला वर्ण, नीललेश्या में नीला वर्ण, कापोतलेश्या में कबूतरी (काला एवं लाल मिश्रित) वर्ण, तेजोलेश्या में लाल वर्ण, पद्मलेश्या में पीला वर्ण और शुक्ललेश्या में श्वेत वर्ण होता है। रस की अपेक्षा कृष्णलेश्या में कड़वा, नीललेश्या में तीखा, कापोतलेश्या में कसैला , तेजोलेश्या में खटमीठा, पद्मलेश्या में आश्रव की भाँति कुछ खट्टा व कुछ कसैला तथा शुक्ललेश्या में मधुर रस होता है। गंध की अपेक्षा कृष्ण, नील व कापोतलेश्याएँ दुर्गन्धयुक्त हैं तथा तेजो, पद्म व शुक्ललेश्याएँ सुगन्धयुक्त हैं। स्पर्श की अपेक्षा कृष्ण, नील व कापोतलेश्याएँ कर्कश स्पर्श युक्त हैं तथा तेजो, पद्म व शुक्ललेश्याएँ कोमल स्पर्श युक्त हैं। प्रदेश की अपेक्षा कृष्णलेश्या से शुक्ललेश्या तक सभी लेश्याओं में अनन्त प्रदेश हैं। वर्गणा की अपेक्षा प्रत्येक लेश्या में अनन्त वर्गणाएँ हैं। प्रत्येक लेश्या असंख्यात आकाश प्रदेशों में स्थित है। यह वर्णन द्रव्यलेश्या के अनुसार है। प्रस्तुत अध्ययन में भाव लेश्या के अनुरूप प्रत्येक लेश्या का लक्षण दिया है। कृष्णलेश्या से युक्त जीव पंचाश्रव में प्रवृत्त, तीन गुप्तियों से अगुप्त, षट्कायिक जीवों के प्रति अविरत आदि विशेषताओं से युक्त होता है, जबकि शुक्ललेश्या वाला जीव धर्मध्यान और शुक्लध्यान में लीन, प्रशान्तचित्त और दान्त होता है, वह पाँच समितियों से समित और तीन गुप्तियों से गुप्त होता है। छहों लेश्याएँ उत्तरोत्तर शुभ हैं। सलेश्य जीव दो प्रकार के हैं-संसार समापन्नक और असंसार समापन्नक। इनमें से जो असंसार समापन्नक हैं उन्हें सिद्ध कहा गया है, यह उचित नहीं लगता। सिद्ध तो अलेश्य होते हैं। यहाँ सिद्ध शब्द मोह क्षय के लक्ष्य को साध लेने वाले जिन के लिए प्रयुक्त हुआ प्रतीत होता है। संसार समापन्नक जीव दो प्रकार के हैं-संयत और असंयत। संयत भी प्रमत्त और अप्रमत्त के भेद से दो प्रकार के हैं। इनमें सिद्ध एवं अप्रमत्त संयत को छोड़कर सभी जीव आत्मारंभी, परारम्भी एवं तदुभयारम्भी हैं, अनारम्भी नहीं हैं। ___लेश्या की भाँति लेश्याकरण और लेश्यानिवृत्ति भी कृष्ण आदि के भेद से छः प्रकार की हैं। जिस जीव के जो लेश्या होती है उसके वही लेश्याकरण और लेश्यानिवृत्ति होती है। नैरयिक जीवों में कृष्ण, नील और कापोत ये तीन लेश्याएँ होती हैं। भवनपति, वाणव्यन्तर, पृथ्वीकाय, अकाय और वनस्पतिकाय में तेजोलेश्या को मिलाकर चार लेश्याएँ हैं। तेजस्काय, वायुकाय और विकलेन्द्रिय जीवों में कृष्ण से कापोत तक तीन लेश्याएँ हैं। वैमानिक देवों में तेजो, पद्म व शुक्ल-ये तीन लेश्याएँ हैं। तिर्यञ्च पंचेन्द्रिय और मनुष्य में छहों लेश्याएँ हैं। ज्योतिषी देवों में एक मात्र तेजोलेश्या है। चार गतियों की अपेक्षा विस्तार से लेश्या का निरूपण भी इस अध्ययन में हुआ है। समस्त सलेश्य जीवों का दण्डक क्रम से सात द्वारों में निरूपण महत्त्वपूर्ण है। वे सात द्वार हैं-१. सम आहार, शरीर व उच्छ्वास, २. कर्म, ३. वर्ण, ४. लेश्या, ५. वेदना, ६. क्रिया और ७. आयु। यहाँ कर्म और क्रिया में भेद है। कर्म तो अल्पकर्म एवं महाकर्म के भेद से दो प्रकार का होता है तथा क्रियाएँ पाँच हैं-१. आरम्भिकी, २. पारिग्रहिकी, ३. मायाप्रत्यया, ४. अप्रत्याख्यान क्रिया और ५. मिथ्यादर्शन प्रत्यया। लेश्याओं का परस्पर परिणमन होता है या नहीं इस प्रश्न पर विचार करते हुए कहा गया है कि कृष्णलेश्या नीललेश्या को प्राप्त होकर उसी के रूप में, उसी के वर्ण में, उसी के गंध में, उसी के रस में, उसी के स्पर्श रूप में पुनः पुनः परिणत होती है। इसी प्रकार नीललेश्या कापोतलेश्या को प्राप्त होकर, कापोतलेश्या तेजोलेश्या को प्राप्त होकर, तेजोलेश्या पद्मलेश्या को प्राप्त होकर, पद्मलेश्या शुक्ललेश्या को प्राप्त होकर उसी के रूप में यावत् (८४२ )
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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