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________________ ८४० उक्कोसेणं - बावट्ठे सयं, अट्ठसयं खवगाणं, चउप्पण्णं उवसामगाणं । पुव्यपडिवन्नए पडुच्च सिय अस्थि, सिय णत्थि । जड़ अत्थि जहन्ने एक्को वा दो या, तिष्णि वा, उक्कोसेणं-सयहुतं । " प. अहवखायसंजया णं भंते ! एगसमएणं केवइया होज्जा ? उ. गोयमा पडिवज्जमाणए पहुच्च सिय अस्थि, सिय नत्यि जड़ अस्थि, जहन्ने एक्को वा, दोवा, तिण्णिवा, उक्कोसेण बावहं सयं अट्ठसयं खवगाणं, चउपन्न उवसामगाण। " पुव्वपडिवन्नए पडुच्च - जहन्नेणं वि कोडिपुहुत्तं, उक्कोसेणं वि कोडिपुहुत्तं । ३६. अप्प बहुप-दारं प. एएसि णं भंते १ सामाइय २. छेदोवडावणिय ३. परिहारविसुद्धिय, ४. सुहुमसंपराय, ५. अहक्खायसंजयाणं कपरे कवरेहिंतो अप्पा विसेसाहिया वा ? वा जाव उ. गोयमा ! १. सव्वत्थोवा सुहुमसंपरायसंजया, २. परिहारविसुद्धियसंजया संखेज्जगुणा, ३. अहक्खायसंजया संखेज्जगुणा, ४. छेदोवडावणियसंजया संखेज्जगुणा, ५. सामाइयसंजया संखेज्जगुणा । - विया. स. २५, उ. ७, सु. १-१८८ ८. पमत्तापमत्त संजयस्स पमत्तापमत्त संजय भावस्स काल परूवणं प. पमत्तसंजयस्स णं भंते! पमत्तसंयमे वट्टमाणस्स सव्वा वि यणं पमत्तद्धा कालओ केवच्चिर होइ ? उ. मंडियपुत्ता ! एगजीवं पडुच्च जहन्नेणं एक्कं समयं, उयकोसेण देसूणा पुव्यकोडी गाणा जीवे पहुंच्च सव्यद्धा । प. अपमत्तसंजयस्स णं भंते ! अपमत्तसंयमे वट्टमाणस्स सव्वा वि य णं अपमत्तद्धा कालओ केवच्चिरं होइ ? उ. मंडियपुत्ता ! एगजीवं पडुच्च- जहन्नेणं अंतोमुहुत्तं, उक्कोसेण पुव्यकोडी देखूणा णाणा जीवे पहुंच्च सव्वद्धं । - विया. स. ३, उ. ३, सु. १५-१६ ९. देवाणं संजयत्ताइ पुच्छाए गोयमस्स भगवओ समाहाणं प. भंते! त्ति भगवं गोयमे समण भगवं महावीर वंदइ नमस वदित्ता नमसित्ता एवं वयासी प. देवा णं भंते! संजयाइति वत्तव्वं सिया ? द्रव्यानुयोग - (२) उत्कृष्ट - एक सौ बासठ होते हैं, अर्थात् एक सौ आठ क्षपकों के और चौपन उपशामकों के होते हैं। ३६. प्र. पूर्वप्रतिपन्न की अपेक्षा कभी होते हैं और कभी नहीं होते हैं। यदि होते हैं तो जघन्य-एक, दो, तीन, उत्कृष्ट - अनेक सौ । भन्ते ! यथाख्यात संयत एक समय में कितने होते हैं ? प्र. उ. गौतम प्रतिपद्यमान की अपेक्षा कभी होते हैं और कभी नहीं होते हैं। यदि होते हैं तो जघन्य-एक, दो, तीन, उत्कृष्ट - एक सौ बासठ होते हैं, अर्थात् एक सौ आठ क्षपकों के और चौपन उपशामकों के होते हैं। पूर्वप्रतिपन्न की अपेक्षा जघन्य भी अनेक क्रोड और उत्कृष्ट भी अनेक क्रोड होते हैं। अल्प- बहुत्व - द्वार भन्ते १ सामायिक, २. छेदोपस्थापनीय, ३. परिहारविशुद्धिक, ४. सूक्ष्म संपराय ५. यथाख्यात संयत इनमें से कौन किससे अल्प यावत् विशेषाधिक है ? " उ. गौतम ! 9. सबसे अल्प सूक्ष्म संपराय संयत है, २. (उनसे) परिहारविशुद्धिक संयत संख्यातगुणा है, ३. (उनसे) यथाख्यात संयत संख्यातगुणा है, ४. ( उनसे छेदोपस्थापनीय संयत संख्यातगुणा है. ५. ( उनसे) सामायिक संवत संख्यातगुणा है। ८. प्रमत्त और अप्रमत्त संयत के प्रमत्त तथा अप्रमत्त संयत भाव का काल प्ररूपण प्र. भंते! प्रमत्त संयत में प्रवर्तमान प्रमत्त संयमी का सब मिलाकर प्रमत्त संयम काल कितना होता है ? उ. मण्डितपुत्र ! एक जीव की अपेक्षा जघन्य एक समय और उत्कृष्ट देशीन पूर्वकोटि और अनेक जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होता है। प्र. भन्ते ! अप्रमत्त संयम में प्रवर्तमान अप्रमत्त संयमी का सब मिलाकर अप्रमत्त संयत काल कितना होता है ? उ. मण्डितपुत्र ! एक जीव की अपेक्षा जघन्य अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट देशोनपूर्वकोटि और अनेक जीवों की अपेक्षा सर्वकाल होता है। ९. देवों के संयतत्त्वादि के पूछने पर भगवान द्वारा गौतम का समाधान प्र. भन्ते ! इस प्रकार सम्बोधित करके भगवान गौतम ने श्रमण भगवान महावीर को वन्दन नमस्कार किया और इस प्रकार पूछा प्र. भंते ! क्या देवों को संयत कहा जा सकता है ?
SR No.090159
Book TitleDravyanuyoga Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1995
Total Pages806
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size29 MB
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