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________________ ( ६२ द्रव्यानुयोग-(१) अजहण्णमणुक्कोसठिईएविएवं चेव। अजघन्य-अनुत्कृष्ट (मध्यम) स्थिति वाले मनुष्यों के पर्याय भी इसी प्रकार कहने चाहिए। णवरं-ओगाहणट्ठयाए चउट्ठाणवडिए, विशेष-अवगाहना की अपेक्षा चतुःस्थानपतित है, ठिईए चउट्ठाणवडिए, स्थिति की अपेक्षा चतुःस्थानपतित है, आइल्लेहिं चउनाणेहिं छट्ठाणवडिए, आदि के चार ज्ञानों की अपेक्षा षट्स्थानपतित है, केवलनाणपज्जवेहिं तुल्ले, केवलज्ञान के पर्यायों की अपेक्षा तुल्य है, तिहिं अण्णाणपज्जवेहि, तीन अज्ञान पर्यायों, तिहिं दसणपज्जवेहि य छट्ठाणवडिए, तीन दर्शन पर्यायों की अपेक्षा षट्स्थानपतित है, केवलदर्शन केवलदसणपज्जवेहिं तुल्ले। ' के पर्यायों की अपेक्षा तुल्य है। प. जहण्णगुणकालयाणं भंते ! मणुस्साणं केवइया पज्जवा प्र. भंते ! जघन्य गुण कृष्ण मनुष्यों के कितने पर्याय कहे गये हैं ? पण्णत्ता? उ. गोयमा ! अणंता पज्जवा पण्णत्ता। उ. गौतम ! अनन्त पर्याय कहे गए हैं। प. सेकेणटेणं भंते ! एवं वुच्चइ प्र. भंते ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है कि"जहण्णगुणकालयाणं मणुस्साणं अणंता पज्जवा "जघन्यगुण कृष्ण मनुष्यों के अनन्त पर्याय हैं?" पण्णत्ता?" उ. गोयमा ! जहण्णगुणकालए मणूसे जहण्णगुणकालगस्स उ. गौतम ! एक जघन्यगुण कृष्ण मनुष्य दूसरे जघन्य गुण कृष्ण मणुसस्स मनुष्य से(१) दव्वट्ठयाए तुल्ले, (१) द्रव्य की अपेक्षा तुल्य है, (२) पदेसठ्ठयाए तुल्ले, (२) प्रदेशों की अपेक्षा तुल्य है, (३) ओगाहणट्ठयाए चउट्ठाणवडिए। (३) अवगाहना की अपेक्षा चतुःस्थानपतित है, (४) ठिईए चउट्ठाणवडिए। (४) स्थिति की अपेक्षा चतुःस्थानपतित है, (५) कालवण्णपज्जवेहिं तुल्ले, (५) कृष्ण वर्ण के पर्यायों की अपेक्षा तुल्य है, अवसेसेहिं वण्ण, (६) गंध, (७) रस, (८) शेष वर्ण, ६. गन्ध, ७. रस, ८. स्पर्श के पर्यायों की फासपज्जवेहि य छट्ठाणवडिए, अपेक्षा षट्स्थानपतित है (९) चउहि णाणेहिं छट्ठाणवडिए, केवलणाणपज्जवेहि (९) चार ज्ञानों की अपेक्षा षट्स्थानपतित है, केवलज्ञान के तुल्ले, पर्यायों की अपेक्षा तुल्य है, . (१०) तिहिं अण्णाणपज्जवेहि, (१०) तीन अज्ञान पर्यायों (११) तिहिं दसणपज्जवेहिं छट्ठाणवडिए, (११) तीन दर्शन पर्यायों की अपेक्षा षट्स्थानपतित है, केवलदसणपज्जवेहिं तुल्ले। केवलदर्शन पर्यायों की अपेक्षा तुल्य है। से तेणटेणं गोयमा ! एवं वुच्चइ इस कारण से गौतम ! ऐसा कहा जाता है कि"जहण्णगुणकालयाणं मणुस्साणं अणंता पज्जवा "जघन्यगुण कृष्ण मनुष्यों के अनन्त पर्याय हैं।" पण्णत्ता।" एवं उकोसगुणकालए वि। इसी प्रकार उत्कृष्टगुण कृष्ण मनुष्यों के पर्याय भी कहने चाहिए। अजहण्णमणुक्कोसगुणकालए वि एवं चेव। अजघन्य-अनुत्कृष्ट (मध्यम) गुण कृष्ण मनुष्यों के पर्याय भी इसी प्रकार कहने चाहिए। णवर-सट्ठाणे छट्ठाणवडिए। विशेष-स्वस्थान में षट्स्थानपतित है। एवं पंच वण्णा, दो गंधा, पंच रसा, अट्ठ फासा इसी प्रकर पांच वर्ण, दो गन्ध, पांच रस एवं आठ स्पर्श वाले भाणियव्या। मनुष्यों के पर्याय भी कहने चाहिए। प. जहण्णाभिणिबोहियणाणीणं भंते ! मणुस्साणं केवइया प्र. भंते ! जघन्य आभिनिबोधिक ज्ञानी मनुष्यों के कितने पर्याय पज्जवा पण्णत्ता? कहे गये हैं? १. जघन्य आभिनिबोधिक ज्ञान वाले मनुष्यों में दसवां अज्ञान स्थान नहीं है इसलिए इनमें दस स्थानों से पर्यवों की संख्या कही है।
SR No.090158
Book TitleDravyanuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj & Others
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year1994
Total Pages910
LanguageHindi, Prakrit
ClassificationBook_Devnagari, Metaphysics, Agam, Canon, & agam_related_other_literature
File Size32 MB
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