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________________ दि० जैन व्रतोद्यापन संग्रह | [ २४७ सुमुनिविजयकीर्चेः शिष्य नारायणाख्यो । दुरितनिवायै तान्मुनीनर्धयामि ।। ॐ ह्रीं चतुर्दशमलत्यक्ताहारग्राहकमुनिभ्यो महाघं । यो नित्यप्रणिधान संश्रितमना संसारनिर्विणह | यो रत्नत्रयधारणां चित्तमतिः कायारिविध्वंशकः ॥ यो विज्ञान रसायनामृतघयस्फीतांगसंगातिगः । श्रीमुसंघजन (?) मुनीश्वरमहासंघो वतां सर्वदा || इत्याशीर्वादः । छप्पय । पूय अस्रपलनाम अस्थि अजिनमल जाणह । नख केश मल दोय एक विकलत्रय मानह || सूरण आद्य कुकन्द बीज फुनिमूल अनेकह । फल बदरीफल आदि कण फुनि कुन्ड विवेकह | एह चतुर्दश मल रहित, शुद्ध आहार मुनिवर कह्यो । नारायण ब्रह्मचारी कहे, जिन सिद्धांते संग्रह्यो । इति चतुर्दशमला रहिताहारग्राहकमुनि पूजा । अत्र षण्नवत्यकिंकशत परिमितान् जाप्यान, देयात् । जाप्य ( १४ x १४ ) = १९६ देयात् । जाप्य मंत्र - ॐ ह्रीं अहं हंस अनन्त के लिये नमः ।
SR No.090154
Book TitleDigambar Jain Vratoddyapan Sangrah
Original Sutra AuthorN/A
AuthorFulchand Surchand Doshi
PublisherDigambar Jain Pustakalay
Publication Year1986
Total Pages408
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Ritual_text, & Ritual
File Size20 MB
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