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________________ २६६] परमार मुकादमिरगा | महावत की पाँच भावना भूत्र ४३२ परिशिष्ट-१ बिय मुसावाय विरमण महत्वयस्स पंच भावणा--- मृषावाद-विरमण या सत्य महावत की पांच भावना-- ४३२. १. अग्रवीतिमासगया, ४३२. (१) अनुवीचिभाषण-चिन्तन करके बोलना, २. कोहविवेगे, (२) क्रोध-विवेक-कोत्र त्यागकर बोलना, ३. लोमविवेगे, (३) लोभ-विवेक-लोभ त्यागकर बोलना, ४. भय षिवेगे, (४) भय-विवेक-भय त्यागकर बोलना, ५. हासविबेमे, सम. २५, सु. १६५ (५) हास्य-विवेक हास्य त्यागकर बोलना, तस्स दमा व भावनाओ रितियस्स वयस्स अलियवयास द्वितीय अलीक वचन विरमण व्रत की रक्षा के लिए ये पात्र वेरमण-परिरक्तगट्टयाए। भावनाएं कही हैंपढम-सोळण संवर? परमट्ठसुठ जाणिकणं ण वेगियं प प्रथम - सत्य वचन रूप संवर का अर्थ गुरु के समीप और सुरियं ण चवलं ग कऽयं ण फरसं ण साहसं या य परस्स उसका परमार्थ सम्यक् प्रकार से समझकर वेग, त्वरा एवं चपलता पीलाकरं सावन, पूर्वक अनिष्ट कठोर साहसिक परपीडाकारी और सावध वचन नहीं बोसने चाहिए। सच्च च हियं न मियं च गाहगं च सुई संगयमकाहलं च सत्य हितकारी परिमित ग्राहक (प्रतीतिजनक) शुद्ध समिक्खियं संजएण कालम्मि य वत्सग्वं । सुसंगत स्पष्ट विचार युक्त बचन संयमी जनों को यथासमय बोलने चाहिए। एवं अगुवोइसमिइजोगेण माविओ मवइ अंतरपा संजयकर. इस प्रकार जिसका अन्तरात्मा अनुविचिन्त्य समिति के योग चरण-णयण वपणो सूरो सम्बवरजवसंपणो। से युक्त होता है। उसका अन्तरात्मा हाथ पैर नेष एवं मुख को संयत करने वाला शौर्य तथा सरल सत्य से परिपूर्ण हो जाता है। वियं-कोहो ग सेवियम्बो, कुडो पंडिक्किमओ मणसो । द्वितीय --क्रोध नहीं करना चाहिए, ऋद्ध और द्र मनुष्य-- १. अलियं भणेज्ज पिमुणं भस्म, फरसं भगेज, अलिय- (१) असत्य भाषण करता है, पंशुन्च-चुगली करता है, पिसुण-फलसं मणेन । कठोर वचन बोलता है, और असत्य, पैशुन्य एवं कठोर ववनों का प्रयोग करता है। २. कलह करेजा, बेरं करेग्जा, विकह करेग्मा, कसहं-बेरं (२) कलह करता है, वैर करता है, विकया करता है और विकह करेज्मा, कलह, वैर एवं विकथा करता है । ३. सच्च हणेन, सीसं हज्ज, विणयं हणज्ज, सउचं सोनं (३) सत्य का घात करता है, शील का घात करता है, विणयं हणेज्ज । विनय का घात करता है और सत्य, शील एवं विनय का घात करता है। ४. बेसो भवेज्ज, वरधुं भवेज्म, गम्मो भवेज्ज, वेतो वरथु (४) ष का पात्र बनता है, दोष का पात्र बनता है, निन्दा गम्मो भवेज्ज । का पात्र बनता है और हूँष, दोष एवं निन्दा का पात्र बनता है। एवं अण्णं च एवमाइयं मणेज कोहग्गिसंपलित्तो तम्हा कोहो जो क्रोधाग्नि से प्रज्वलित है वह इस प्रकार के तथा अन्य ज सेवियम्यो। प्रकार के मृषा वचन बोलता है, इसलिए क्रोध नहीं करना चाहिए। एवं खंतोइ माविओ भवइ अंतरप्पा संजयकर-घरगणयाण- इस प्रकार जिसका अन्तरात्मा क्षमा से भावित होता है अपमो सूरो सञ्चवजयसंपण्णो। उसके हाथ, पैर, नेत्र एवं मुख संयत हो जाते हैं तथा वह शौर्य एवं सरल सत्य से परिपूर्ण हो जाता है।
SR No.090119
Book TitleCharananuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages782
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size23 MB
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