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________________ २६४] चरणानुयोग अल्पमृषावाव का प्रायश्विस्त सूत्र त्र४२७-४३१ अत्तहियं पेवाभावियं आगमेसिमदं मुखं णेयाउयं अकुडिल यह प्रवत्रन आत्म हितकर है, परभव में शुभ फल देने वाला अणुतरं सवतुक्त पावाण विउसमर्थ। है, भविष्य में कल्याणकारी है. शुद्ध है, न्याय युक्त है, कुटिलता -प. सु. २, अ. २. सु. १० से रहित है, सर्वोत्तम है, रामस्त दुःखों और पापों को शान्त करने वाला है। अप्पमुसावायरस पायच्छित्तसुत्तं अल्पमृषावाद का प्रायश्चित्त सूत्र--- ४२८. जे भिक्खू सहुसगं मुसं वरयंत वा माटाइ। ४२८.भो भिक्ष अल्प मृषावाद बोलता है, बुलवाता है, बोलने वाले का अनुमोदन करता है। सं सेवमाणे आषज्जह मासियं परिहारट्ठाणं अणुग्धाइयं । उसे मासिक अनुदधातिक परिहारस्थान (प्रायश्चित्त) -नि, उ. २, सु. १६ आता है । वसराइयं अवसुराइयं वयमाणस्स पायच्छित्तसुताई- वसुरानिक-अवसुरालिक कथन के प्रायश्चित्त सूत्र--- ४२६. जे भिवस्व खुसिराइयं अबुसिराइयं वपद बयंत दा साइजइ। ४२६. जो भिक्षु धनवान को निधन कहता है, कहलवाता है, कहने वाले का अनुमोदन करता है। जे भिक्खू अबुसिराइयं वृसिराइयं बयइ वयंत वा साइजइ। जो भिक्षु निर्धन को धनवान कहता है, कहलवाता है. कहने वाले का अनुमोदन करता है। तं सेवमागे आयज्जइ चाउम्मासिय परिहारहाण उग्नाइय। उसे चातुर्मासिक उद्घातिक परिहारस्थान (प्रायश्चित्त) –नि उ. १६. सु. १४-१५ आता है। बिवरीय वयमाणस्स पायच्छित्त सुतं विपरीत कथन का प्रायश्चित्त सूत्र४३०, जे भिक्खू गरिय संमोगवतिया' किरित्ति वयह बयंत वा ४३०. जो भिक्षु "संभोग पत्तिया किया नहीं है" ऐसा कहता साइन्जा। है, कहलवाता है, कहने वाले का अनुमोदन करता है। तं सेवमाणे आवजह मासियं परिहारहाणं उग्धाइयं । उसे मासिक उद्घातिक परिहारस्थान (प्रायश्चित्त) -नि. उ. ३, सु. ६३ आता है। विवरीय पायच्छित्तं बदमाणस्स पायच्छित्त सत्ताई - विपरीत प्रायश्चित्त कहने के प्रायश्चित सूत्र--. ४३१. जे भिक्खू उन्धाहपं अणुग्धाइयं बयह वयंस वा साइज्जद। ४३१. जो भिक्षु उद्घातिक को अनुदातिक कहता है, कहलवाता है, कहने के लिए अनुमोदन करता है। जे मिरल अणुग्धाइयं उग्याइपं वह वयंतं वा साइग्जद । जो भिक्षु अनुद्घातिक को उद्घातिक कहता है, कहलवाता है. कहने के लिए अनुमोदन करता है। जे मिक्खू उग्धाइयं अणुग्धाइयं देइ त वा साजा । जो भिक्षु उद्घातिक प्रायश्चित्त बाले को अनुद्घातिक प्राय. श्चित्त देता है, दिलाता है, देने वाले का अनुमोदन करता है। जे भिवायू अणुरघाइयं उघाइयं बेइ देत वा साइज्जद । ___ जो भिक्षु अनुदघातिक प्रायश्चित्त वाले को उद्घातिक प्रायश्चित्त देता है, दिलाता है, देने वाले का अनुमोदन करता है। मे मिक्खू उम्पाहम सोच्चा जच्चा संभुजा संभुजतं था जो भिक्षु (किसी अन्य भिक्षु को) उद्घातिक प्रायश्चित्त साइजह।। प्राप्त हुआ है, ऐसा सुनकर या जानकर (उसके साथ) आहार करता है, करवाता है, करने वाले का अनुमोदन करता है। ने भिक्खू उघाइय-हे सोच्या णना संभुजइ संमुजंतं वा जो भिक्षु (क्रिसी अन्य भिक्षु के) उद्घातिक प्रायश्चित्त का साइजह। हेतु सुनकर या जानकर (उसके साय) आहार करता है. करवाता है, करने वाले का अनुमोदन करता है। सम्भोग विसम्भोग विधान के लिए देखिये इसी अनुयोग के 'संघव्यवस्था" में 'गणव्यवस्था" के "सम्भोग विधान" विषय में।
SR No.090119
Book TitleCharananuyoga Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Anuyog Prakashan
Publication Year
Total Pages782
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Conduct, Agam, Canon, H000, H010, & agam_related_other_literature
File Size23 MB
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