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________________ प्रस्तावना और आश्विन नामक वर्ष में अत्यन्त वर्षा होती है।) तुलनात्मक दृष्टि से विचार करने पर दोनों वर्णनों में बहुत अन्तर है । विपय एक होने पर भी फल-फयन करने की शैली भिन्न है। इगी अध्याय में गुरु की विभिन्न गतियों का फलादेश भी वाहा गया है। बुधचार भ० सं० के 18वें अध्याय और वा० सं० या वें अध्याय में आया है। भ० सं० के 18वें अध्याय के द्वितीय श्लोक में बुध की सौम्या, विमिश्रा, संक्षिप्ता, तीब्रा, घोरा, दुर्गा और पापा ये सात प्रकार की गतियाँ बतलायी गयी हैं। वा० सं० के 7वें श्लोक में बुध की प्रकृता, विमिश्रा, संक्षिप्ता, तीक्ष्णा, योगान्ता, भोरा और पा इन गतियों का उल्लेख किया है । तुलना करने से ज्ञात होता है कि भ० सं० में जिस सौम्या कहा है, उसी को वा० सं० में प्रकृता; जिसे भ० सं० में तीबा कहा है, उसे वा० सं० में तीक्ष्णा; भ० सं० में जिसे दुर्गा कहा है, उसे वा० सं० में योगान्ता कहा है। इन गतियों के पलादेशों में भी अन्तर है। वाराहमिहिर ने सभी प्रकार की गलियों की दिन संख्या भी बतलायी है, जब कि भ० सं० इस विषय पर मौन है। अस्त, उदय और वकी आदि का कथन भ० सं० में कुछ अधिक है, जब कि वा० सं० में नाम मात्र को है। अंगारक चार, राहुचार, केतृचार, मुर्य चार और चन्द्रचार विषयक वर्णनों की दोनों ग्रन्थों में बहुत कुछ समता है। कतिपय श्लोकों के भाव ज्यों-के-त्यों मिलते हैं। ___ भद्रबाहुसंहिता का अंगारकचार विस्तृत है, वाराही संहिता का संक्षिप्त । वर्णन प्रक्रिया में भी दोनों में अन्तर है । भद्रबाहुसंहिता (अ० 19; शलोक 11) में मंगल के बक्री का कथन करते हुए कहा है कि मंगल के उष्ण, शोपमुख, व्याल, लोहित और लोहमदगर ये पाँच प्रधान वन हैं । ये वक्र मंगल के उदय नक्षत्रों की अपेक्षा में बताये गये हैं । बाराही संहिता में (अ० (श्नो० 1-5) उष्ण; अश्रुमुख, व्याल, रुधिरामन और अमिगुराल इन वनों का उल्लेख किया है। इन वक्रों में पहले और तीसरे वक्र के नाम दोनों में एक हैं, शेष नाम भिन्न हैं। दूसरी बात यह है कि भ० सं० में सभी यक उदय नक्षत्र के अनुसार वर्णित है, किन्तु वाराही संहिता में व्याल, रुधिरानने और असिमुसल को अस्त नक्षत्रों के अनुसार बताया गया है । भ० सं० (39; 25-34) में कहा गया है कि कृत्तिकादि सात नक्षत्रों में मंगल गमन करे तो कष्ट; माघादि सात नक्षत्रों में विचरण करे तो भय, अनुराधादि सात नक्षत्रों में विचरण करे तो अनीति; धनिष्ठादि मात नक्षत्रों में बिचरण करे तो निन्दित फल होता है । वा० सं० (6; [1-12) में बताया गया है कि रोहिणी, श्रवण, मूल, उत्तराफाल्गुनी, उत्त समाढा, उत्तराभाद्रपद या ज्येष्ठा नक्षत्र में मंगल का विचरण हो तो मेघों का नाश एवं श्रवण, मघा, पुनर्वगु, मूल, हस्त, पूर्वाभाद्रपद, अश्विनी, विशाखा और रोहिणी नक्षत्र में विचरण करता है
SR No.090073
Book TitleBhadrabahu Sanhita Part 1
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
AuthorKunthusagar Maharaj
PublisherDigambar Jain Kunthu Vijay Granthamala Samiti
Publication Year
Total Pages607
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size13 MB
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